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दामन के दाग गजल

बात भी दिल की तुझे हम अब बतायें कैसे

साथ जो हमने बिताये पल भुलायें कैसे

बंद रखना तू न ओठों को बता दे इतना

बात जो दिल पर लिखी तुमने मिटायें कैसे

मौत भी करती रही है वेवफाई मुझसे

पास हम अपने बुलायें तो बुलायें कैसे

आपकी तो चाहतो में खुद जले थे ऐसे

लाश भी कोई हमारी अब जलायें कैसे

खोल कर अपने लबों को तू बता दे यारा

दाग दामन पर लगे हैं वो धुलायें कैसे

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment by Akhand Gahmari on April 17, 2014 at 11:06am

आपके आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन का सदैव आकांक्षी.. मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें, आदरणीय Saurabh Pandey जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 17, 2014 at 12:38am

बह्र को निभाने के लिहाज से आपकी एक सफल कोशिश देख रहा हूँ. वैसे एक जगह काफ़िया पर बात अटक गयी दिखी. जैसे - लाश भी कोई हमारी अब जलायें कैसे...  कोई के बाद जलायें ? या जलाये ? यदि  जलायें तो भाषा व्याकरण के अनुसार गलत .. जलाये तो काफ़िया गलत. बहरहाल आपकी कोशिश भली लगी है.. भाईजी 

Comment by Akhand Gahmari on April 6, 2014 at 2:57pm

आपके आर्शीवाद एवं मार्गदर्शन का सदैव आकांक्षी मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें। आदरणीय Baidyanath Saarthi जी

Comment by Akhand Gahmari on April 6, 2014 at 2:56pm

आपके आर्शीवाद एवं मार्गदर्शन का सदैव आकांक्षी मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें। आदरणीय गिरिराज भंडारी जी

Comment by Akhand Gahmari on April 6, 2014 at 2:56pm

आपके आर्शीवाद एवं मार्गदर्शन का सदैव आकांक्षी मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें। आदरणीय जितेन्‍द्र गीत जी

Comment by Akhand Gahmari on April 6, 2014 at 2:56pm

आपके आर्शीवाद एवं मार्गदर्शन का सदैव आकांक्षी मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें। आदरणीय अखिलेश कष्‍ण जी

Comment by Akhand Gahmari on April 6, 2014 at 2:55pm

आपके आर्शीवाद एवं मार्गदर्शन का सदैव आकांक्षी मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें। आदरणीया coontee mukerji जी

Comment by coontee mukerji on April 6, 2014 at 1:13pm

बहुत मार्मिक गज़ल आशिक के खून से लिखे हों जैसे.....गहमरी जी जो रचना पाठक के दिल छू जाए वहीं सार्थक रचना होती है.बधाई.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 5, 2014 at 12:42pm

अच्छे भाव और सुंदर शब्दों के साथ गज़ल कही। बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 4, 2014 at 9:37pm

आपकी तो चाहतो में खुद जले थे ऐसे

लाश भी कोई हमारी अब जलायें कैसे

खोल कर अपने लबों को तू बता दे यारा

दाग दामन पर लगे हैं वो धुलायें कैसे.............वाह! क्या बात कही. इन शेर पर बहुत बहुत बधाई आदरणीय अखंड जी

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