For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गजल (रहनुमा)

2122 2122 2122 2122

इस शहर मैं रस्मे-आमद लोग इस तरह निभाते हैं
हाथों मैं गुल होते नहीं और पत्थर लिए नजर आते हैं

तेरी सूरत मेरी सूरत से हसीं नहीं बताने को ये
आने वाले हर शख्स को वो आईना दिखलाते हैं

वो भी देख लें कभी गिरेवां मैं अपने झांककर यारों
दूसरों पे जो यूँ ही अक्सर उँगलियाँ ऊठाते हैं

मैं जो निकला हूँ सफर पे तो मंजिल पा ही लूँगा कभी
फिर क्यूँ मुझे मेरी मंजिल का पता बतलाते हैं

जाने किस भेष मैं सामने आ जाये कातिल कोई तेरा
बचके रहना कातिल भी यहाँ रहनुमा नजर आते हैं

( मौलिक एवं अप्रकाशित )

Views: 986

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sachin Dev on March 28, 2014 at 12:41pm

आदरणीय सौरभ जी, आपके सुझाव और शुभेक्षाओं का हार्दिक आभार ........ रचनाओं मैं  उत्तरोत्तर सुधार हेतु सतत प्रयास जारी रहेगा ...... आप सभी गुणीजनो के आपेक्षित सहयोग से सध्न्य्बाद ! 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 28, 2014 at 2:01am

भाई सचिन जी, आपको उचित सुझाव देते हुए सुधीजनों ने आपकी प्रस्तुति को समुचित मान दिया है. आपका सतत प्रयास ही आगे काम करेगा.

शुभेच्छाएँ.

Comment by Sachin Dev on March 26, 2014 at 1:17pm

भाई लछमन धामी जी... आपकी दुआओं और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आपका ! 

Comment by Sachin Dev on March 26, 2014 at 1:16pm

भाई मुकेश वर्मा जी, बहुत ही अच्छी बातें लिखी आपने आपकी इन शुभेक्षाओ के लिए हार्दिक आभार आपका... ऐसे ही उत्साहवर्धन करते रहिये धन्यवाद ! 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2014 at 9:17pm

भाई सचिन जी ,हर्दिक बधाई , प्रयास जारी रखें .हमारी तरह प्रबुद्ध जनों से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा और धर पैनी हो जायेगी .यही दुआ है .

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 24, 2014 at 7:33pm

इस जीवन में प्रयास की असीम संभावनाएँ हैं. हमारा बचपन ही गिरते पड़ते शुरू होता है और हम चलना सीखते हैं. बस लिखना और लिखना ही एक उपाय है मेरी नज़र में. कामयाबी एक दिन ज़रूर आपके क़दम चूमेगी..
बहुत बढ़िया

Comment by Sachin Dev on March 24, 2014 at 3:58pm
आदरणीय गिर्रिराज सी सादर नमस्कार, गजल लिखने के प्रयास पर आपके हौसला प्रद शब्द और मार्गदर्शन के लिए आपका हार्दिक आभार ..... ऐसे ही स्नेह बनाए रखिये धन्यवाद आपका
Comment by Sachin Dev on March 24, 2014 at 3:55pm
आदरणीय भाई वीनस जी प्रयास पर आपने नजर डाली और उत्साहवर्धक शब्द कहे उसके लिए बहुत बहुत आभार आपका ... आपने बिल्कुल सही कहा बहर मैं अभी भी कुछ नही बल्कि काफी उलझन है किन्तु गजल मैं अपने भाव रख सका आपकी सराहना मिली इससे आगे अच्छा लिखने मैं और मदद मिलेगी ......
Comment by Sachin Dev on March 24, 2014 at 3:52pm
सादर प्रणाम आदरणीया राजेश कुमारी जी...... ध्यानाकर्षण और हौसला अफजाई के लिए हार्दिक आभार आपका ......... त्रुटियों को आप गुणीजनों के मार्गदर्शन से दूर करने का प्रयास रहेगा !
Comment by Sachin Dev on March 24, 2014 at 3:44pm
सादर नमस्कार बृजेश जी..... आपने बिल्कुल दुरुस्त फरमाया बहर के हिसाब से अशआर सही नही बैठ रहा है ..... चूँकि अभी मैं गजल सीखने की प्रक्रिया मैं हूँ इसलिए इस प्रकार की चूक होना स्वाभाविक ही है, किन्तु मंच के सुधीजनो के मार्गदर्शन से जल्द ही त्रुटियों को दूर करने का प्रयास रहेगा ... फिलहाल आपके द्वारा चिन्हित अशआर को संशोधित किया है कृपया इस पर दृष्टि डालें और मार्गदर्शन करें ...... धन्यबाद
---------------------------------------------------------------------------------------------------
/इस शहर मैं रस्मे-आमद लोग इस तरह निभाते हैं
हाथों मैं गुल की बजाये पत्थर साथ नजर आते हैं/

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Saturday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Jul 14
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service