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सीमाओं मे मत बांधो

   सीमाओं मे मत बांधो

 

सीमाओं मे मत बांधो, मैं बहता गंगा जल हूँ ।  

गंगोत्री से गंगा सागर

गजल  सुनाती  आई

गंगा की लहरों से निकली –

मुक्तक  और   रुबाई ।                                

भावों मे डूबा उतराता , माटी का गीत गजल हूँ

सीमाओं मे मत बांधो , मैं बहता गंगा जल हूँ ।

यमुना की लहरों पर –

किसने प्रेम तराने गाये ?

राधा ने  कान्हा संग –

जाने कितने रास रचाए ?

होंगे महल दुमहले कितने, मैं तो ताजमहल हूँ

सीमाओं मे मत बांधो , मैं बहता यमुना जल हूँ ।

मैं कबीर का ढाई आखर,

मेरा   कहाँ   ठिकाना ?

इस दुनियाँ मे लगा हुआ है

सबका   आना – जाना ।  

कबीरा का ताना बाना मैं, ढाका का मल मल हूँ

सीमाओं मे मत बांधो मैं बहता नदिया जल हूँ ।

            --- मौलिक एवं अप्रकाशित     

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Comment

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Comment by S. C. Brahmachari on March 30, 2014 at 9:02pm
आ0 बहन राजेश कुमारी जी,
बंधन मुक्त प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार !

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 28, 2014 at 10:57am

वाह वाह आ० जबरदस्त उत्कृष्ट गीत हुआ अतिसुन्दर .बहुत- बहुत बधाई आपको. 

Comment by S. C. Brahmachari on March 14, 2014 at 9:09pm

प्रिय श्री लक्ष्मण प्रसाद लाडीवाला जी ,

प्रशंसा के लिए आभार !

 

Comment by S. C. Brahmachari on March 14, 2014 at 9:04pm

Shri Omprakash Kshatriya Ji,

आपकी प्रशंसा मन को भायी , हार्दिक आभार स्वीकारें !

Comment by S. C. Brahmachari on March 14, 2014 at 8:54pm

श्रद्धेय श्री प्रदीप कुशवाहा जी ,

भागीरथी गंगा कब बंधना चाहती हैं , किन्तु  ईंसान की फितरत तो देखिये - गंगा को मनेरी (उत्तरकाशी) मे , टिहरी बांध (टिहरी) मे बांध ही डाला है । अब ना जाने कंहा कंहा बाँधेगा ?  बंधन मुक्त तो परिंदे हैं । इंसान ने इंसान को जाति , धर्म तथा संप्रदाय के अलावा भी अनेक बंधनो से बांध रक्खा है तभी तो मेरा पागल मन इनसाँ को ढूंढा करता है ~~~~~~~~ ! रचना की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by S. C. Brahmachari on March 14, 2014 at 8:33pm

श्रद्धेय गिरिराज भण्डारी जी,

रचना ने आपके अन्तर्मन को छुआ , आपकी प्रशंसा से ऐसा आभास होता है । हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ ।

Comment by S. C. Brahmachari on March 14, 2014 at 8:26pm

श्री जीतेंद्र गीत जी,

रचना आपको अच्छी लगी , आभार स्वीकार करें ।

Comment by S. C. Brahmachari on March 14, 2014 at 8:21pm

सुश्री मीना जी, वंदना जी

रचना की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2014 at 10:10am

सुंदर और सार्थक गीत रचना के लिए हार्दिक बधाई श्री ब्रह्मचारी जी 

Comment by Omprakash Kshatriya on March 12, 2014 at 7:29am

इस दुनियाँ मे लगा हुआ है

सबका   आना – जाना ।  

कबीरा का ताना बाना मैं, ढाका का मल मल हूँ................... शानदार  सर जी . वास्तविकता उजागर कर गई . ये पंक्तिया . बधाई .

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