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फाइलातुन   फाइलातुन   फाइलुन

(बहरे रमल मुसद्दस महजूफ)

वृत्ति जग की क्लिष्ट सी होने लगी

सोच सारी लिजलिजी होने लगी

भीड़ है पर सब अकेले दिख रहे 
भावनाओं में कमी होने लगी

चाहना में बजबजाती देह भर 
व्यंजना यूँ प्रेम की होने लगी

धर्म के जब मायने बदले गए 
नीति सारी आसुरी होने लगी

सूखती संवेदना घर-घर दिखे 
चेतना भी ठूँठ सी होने लगी

 

ढूँढ अब लाएँ कहाँ से हम किरण

रात सारी मावसी होने लगी

      -  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on March 28, 2014 at 6:48pm

आदरणीया माहेश्वरी जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Maheshwari Kaneri on March 28, 2014 at 1:11pm

भीड़ है पर सब अकेले दिख रहे 
भावनाओं में कमी होने लगी ......बहुत सुन्दर..

Comment by बृजेश नीरज on March 26, 2014 at 7:44pm

आदरणीय भुवन जी आपका बहुत आभार!

Comment by भुवन निस्तेज on March 25, 2014 at 11:44pm

भीड़ है पर सब अकेले दिख रहे 
भावनाओं में कमी होने लगी

बेहतरीन विचार आदरणीय...

बधाई स्वीकार करें 

Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2014 at 9:19pm

आदरणीय मुकेश जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 25, 2014 at 9:02am

आदरणीय बृजेश जी. बहुत खूबसूरत ख़यालों का समावेश किया है आपने इस ग़ज़ल में. हिन्दी के शब्दों का सुंदर प्ययोग किया है आपने और हिन्दी ग़ज़ल को ऊँचाइया प्रदान की हैं..अच्छा लगा पढ़कर.. बहुत मुबारकबाद

Comment by बृजेश नीरज on March 23, 2014 at 9:39am

आदरणीय सौरभ जी, आपका हार्दिक आभार!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 23, 2014 at 2:04am

इस ग़ज़ल ने आपके सतत प्रयासों की हामीभरी है. हृदय से बधाई.

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on March 22, 2014 at 10:10pm

आदरणीया शशि जी, आपका बहुत-बहुत आभार!

Comment by shashi purwar on March 22, 2014 at 9:57pm

वाह वाह बहुत खूब आज के परिपेक्ष को दर्शाती हुई सुन्दर गजल हेतु हार्दिक बधाई बृजेश जी।  सभी  शेर बहुत अच्छे लगे

कृपया ध्यान दे...

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