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मगर फिर चार दिन की ये जवानी कौन देता है...

पहले मौत दे, फिर जिंदगानी कौन देता है
मुकम्मल हो सके ऐसी कहानी कौन देता है,

यहां तालाब और नदियां कई बरसों से सूखी हैं
खुदा जाने कि पीने को ये पानी कौन देता है,

हमें तो जिंदगी ठहरी हुई इक झील लगती है
मगर हर वक्त दरिया को रवानी कौन देता है,

जमीं से आसमां तक का सफर हम कर चुके लेकिन
नहीं मालूम मंजिल की निशानी कौन देता है,

परिंदे जानते हैं ये कि पर कटने का खतरा है
इन्हें फिर हौसला ये आसमानी कौन देता है,

अतुल ये जानता हूं कि बुढापा आएगा इक दिन
मगर फिर चार दिन की ये जवानी कौन देता है।।

 — अतुल कुशवाह

- मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by atul kushwah on January 18, 2014 at 11:07pm

आदरणीय अखिलेश जी, अजय जी, उत्साह बढाने के लिए तहेदिल से शुक्रिया। सादर— अतुल

Comment by ajay sharma on January 18, 2014 at 11:05pm

परिंदे जानते हैं ये कि पर कटने का खतरा है
इन्हें फिर हौसला ये आसमानी कौन देता है,.............bahut khoob ....................

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 18, 2014 at 10:03pm

आदरणीय अतुल भाई, 

सुंदर भाव , सुंदर शब्दों का खूबसूरती से प्रयोग़ , हार्दिक बधाई 

Comment by atul kushwah on January 18, 2014 at 4:43pm

आदरणीय श्याम नरायन जी, एक कोशिश को सराहने के लिए बहुत—बहुत आभार। सादर— अतुल

Comment by Shyam Narain Verma on January 18, 2014 at 2:41pm
बहुत उम्दा ... बहुत बहुत बधाई.....

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