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सुन्दर दृश्य उत्पन्न करती हैं

एक साथ जलती ढेरों मोमबत्तियाँ

 

भीड़ से घिरी उनकी रोशनी

कसमसाकर दम तोड़ देती है

 

वातावरण में घुले नारे

खंडहर में पैदा हुई अनुगूँज की तरह

कम्पन पैदा करते हैं

 

सर्द हवाएँ

काँटों की तरह चुभती हैं

 

अँधेरा गहराता जा रहा है 

___

बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 803

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Comment by बृजेश नीरज on January 7, 2014 at 10:11pm

आदरणीय  अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी, आदरणीय  शिज्जु शकूर जी, आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on January 7, 2014 at 10:10pm

आदरणीया महिमा जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on January 7, 2014 at 10:09pm

आदरणीय अजय शर्मा जी आपका हार्दिक आभार! अपना आशीष यूँ ही बनाये रखियेगा!

Comment by बृजेश नीरज on January 7, 2014 at 10:08pm

आदरणीया कुंती जी आपका हार्दिक आभार!

कविताई आपकी किताब पढ़कर ही सीख रहा हूँ! आपकी जितनी किताबें पढनें को मिलती रहेंगी, मैं भी सीख-सीखकर लिखता रहूँगा! आपकी अगली किताब की प्रतीक्षा है!

सादर!

Comment by बृजेश नीरज on January 7, 2014 at 10:04pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी, गिरिराज भंडारी जी, Dr Ashutosh Mishra जी, आप सभी का हार्दिक आभार!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on January 7, 2014 at 9:49pm

प्रतीकों में विरोध को रेखांकित करने का यह हुनर कहाँ से सीखा भाई................बेहतरीन..................बधाइयाँ.....................


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 7, 2014 at 9:21pm

आदरणीय बृजेश जी आपने संक्षेप में लेकिन माहौल का सटीक वर्णन किया है बेहतरीन रचना बधाई स्वीकार करें

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 7, 2014 at 7:37pm

सुंदर रचना की बधाई बृजेश भाई॥ आजकल लाइव टेलीकास्ट होने से भी आंदोलन , विरोध प्रदर्शन  करने वालों में  एक  नया जोश भर जाता  है , कुछ देर के लिए ही सही ॥  

Comment by MAHIMA SHREE on January 7, 2014 at 7:30pm

एक अलग वातावरण में ले जाती रचना जहाँ सच की रौशनी तीव्र तो  होती है पर  कभी भी क्षीण होकर बुझ सकती है .... आदरणीय ब्रिजेश जी ... हार्दिक  बधाई आपको ...

Comment by ajay sharma on January 7, 2014 at 7:19pm

.......................................एक साथ जलती ढेरों मोमबत्तियाँ

 aur  fir .......................................अँधेरा गहराता जा रहा है  ...wah kya khoobsoorat virodhabhasi isthiti prastut ki hai ........shreshtha.............bahut bahut shubkamnayen  

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