For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ढूँढती है एक चिड़िया

इस शहर में नीड़ अपना

आज उजड़ा वह बसेरा

जिसमें बुनती रोज सपना

 

छाँव बरगद सी नहीं है

थम गया है पात पीपल

ताल, पोखर, कूप सूना

अब नहीं वह नीर शीतल

 

किरचियाँ चुभती हवा में

टूटता बल, क्षीण पखना

 

कुछ विवश सा राह तकता

आज दिहरी एक दीपक

चरमराती भित्तियाँ हैं

चाटती है नींव दीमक

 

आज पग मायूस, ठिठके

जो फुदकते रोज अँगना

 

भीड़ है हर ओर लेकिन

पथ अपरिचित, साथ छूटा

इस नगर के शोर में अब

नेह का हर बंध टूटा

 

खोजती है एक कोना

फिर बनाये ठौर अपना

 

-  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 1003

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश नीरज on November 28, 2013 at 6:46pm

आदरणीया कल्पना दीदी आपका हार्दिक आभार!

Comment by कल्पना रामानी on November 28, 2013 at 6:35pm

वाह, वाह!! बहुत ही सुंदर नवगीत रचा है बृजेश जी, बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by बृजेश नीरज on November 27, 2013 at 9:51pm

आदरणीया महिमा जी आपका बहुत बहुत आभार! आपके शब्दों ने मेरे प्रयास को सार्थकता प्रदान की है!

Comment by बृजेश नीरज on November 27, 2013 at 9:49pm

आदरणीय सौरभ जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on November 27, 2013 at 9:49pm

आदरणीया प्राची जी आपका हार्दिक आभार! रचना आपको पसंद आई मेरा प्रयास सार्थक हुआ!

Comment by MAHIMA SHREE on November 27, 2013 at 7:25pm

ढूँढती है एक चिड़िया

इस शहर में नीड़ अपना.....

 

भीड़ है हर ओर लेकिन

पथ अपरिचित, साथ छूटा

इस नगर के शोर में अब

नेह का हर बंध टूटा....

खोजती है एक कोना

फिर बनाये ठौर अपना

 

वाह बेहद सुंदर भावाभिव्यक्ति आदरणीय ब्रिजेश जी  .... अपने ही प्रवाह में बहा ले गयी ..  देर तक सोचती रही और अपने आप से जोडती भी रही .... पंक्ति पंक्ति शब्द शब्द ...... हार्दिक बधाई स्वीकार करें  

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 27, 2013 at 5:57pm

भाई बृजेशजी, आपकी यह रचना (नवगीत) संयत, संतुलित और स्पष्ट है. मैं इस प्रस्तुति को मय टिप्पणियाँ पढ़ गया. अन्य पर बाद में, पहले आप हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये और ऐसे ही लिखते रहिये. शुभ-शुभ.

आगे.. प्रतीत हो रहा है कि कई या कुछ तथ्य कई रचनाकारों के पास सटीक नहीं पहुँचे हैं. और इस कारण भ्रम बना हुआ है जो टिप्पणियों के माध्यम से सामने आता है. लेकिन जिस ढंग से इस मंच पर सीखने-सिखाने की निरंतरता बनी हुई है, ऐसे संवादों का नतमस्तक स्वागत होना चाहिये.

आदरणीय गिरिराजजी की शंकाओं का आपने तार्किक रूप से निवारण किया है. आपकी तार्किक स्पष्टता श्लाघनीय है. आदरणीय गिरिराजभाई ने तो शहर या बहर आदि की कुल अवधारणा पर ही प्रश्न उठा दिया था जो कि ग़ज़ल के प्रभाव का अज़ीब सा परिणाम है. उचित तो यह है कि हिन्दी भाषा में प्रयुक्त शब्द के मूल की ओर जाने या उसे अपनाने की ज़िद जहाँ है, उसे हम वहीं रहने दें.

इस मामले में साझा करता चलूँ कि ग़ज़ल के क्षेत्र में एक स्थापित और सर्वस्वीकार्य नाम इलाहाबाद से एहतराम इस्लाम साहब का स्पष्ट मत है कि हिन्दी भाषा में प्रयुक्त हो रहे उर्दू भाषा से आये कई शब्दों के विरुद्ध ऐसी कोई ज़िद भाषा विज्ञान की मान्यताओं और मानकों को नकारती हुई ज़िद है. हाँ, उर्दू रचनाओं में अरबी या फ़ारसी या उर्दू के शब्दों के प्रति ऐसा आग्रह उचित है, भले उर्दू भाषा की लिपि देवनागरी क्यों न हो. क्या यही मत मेरा नहीं रहा है ? 

भाई शिज्जूजी के कहे पर आपके विन्दु मुखर हो करसामने आये हैं.

आपने २१२२ २१२२ के वज़्न पर सुन्दर रचना आयी है. और लघु वर्ण को आपने भरसक लघु मात्रिक ही रहने दिया है, न कि गुरु वर्ण को गिराने की नौबत आयी है. इसी तरह की बात की तरफ़ लखनऊ में आदरणीय मधुकर अष्ठाना ने इशारा किया था. आपके प्रस्तुत गीत में अपवाद स्वरूप एक स्थान है, जिसमें बुनती रोज सपना ..

लेकिन, में चूँकि कारक की विभक्ति है अतः इस पर विद्वानों की विकट दृष्टि नहीं पड़नी चाहिये.

आपका सुन्दर प्रयास मुग्धकारी है.
शुभ-शुभ
 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 27, 2013 at 4:21pm

गीत की विषयवस्तु बहुत सुन्दर है... और भाव दशा के अनुरूप सहज शब्द भी सुन्दरता सार्थकता से संयोजित हैं.

और शिल्प भी बहुत सुन्दर है.

भीड़ है हर ओर लेकिन

पथ अपरिचित, साथ छूटा

इस नगर के शोर में अब

नेह का हर बंध टूटा

 

खोजती है एक कोना

फिर बनाये ठौर अपना

इस भावमय सुगढ़ प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on November 26, 2013 at 6:12pm

आदरणीय आशुतोष जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 26, 2013 at 1:44pm

आदरणीय ब्रिजेश जी ..अशानदार नवगीत के माध्यम से वर्तमान परिदृश्य का सजीव चित्रण किया है आपने..ह्रदय की पीड़ा भी दर्शाई है और विवशता में टूटकर नए आशियाने के खोज की माध्यम से हार न माने का अद्भुत सन्देश भी समाहित है ..मेरी तरफ से ढेरों बधाई..सादर 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
9 hours ago
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
yesterday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
yesterday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो…"
yesterday
आशीष यादव posted a blog post

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे…See More
yesterday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday
आशीष यादव commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"एक बेहतरीन ग़ज़ल रचा है आपने। बिलकुल सामयिक।  इस बढ़िया रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday
आशीष यादव commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"सदियों से मनुष्य प्रकृति का शोषण करता रहा है, जिसे विकास समझता रहा है वह विनास की एक एक सीढ़ी…"
Monday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .अधर
"वाह। "
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service