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मंदिरों में है बसेरा मस्जिदों में घर तेरा

मंदिरों में है बसेरा मस्जिदों में घर तेरा 
ऐ परिन्दा बोल आख़िर कौन है रहबर तेरा ?

तेरे ज़ख्मों को भरेगा कौन ऐ हिन्दोस्तां ?
मुददतों से है पड़ा बीमार चारागर तेरा 

अम्न के दुश्मन ने फिर ओढ़ा है चाँदी का नक़ाब 
हो न जाये बेअसर इस बार भी पत्थर तेरा 

इस तरफ मोहताज टूटी खाट को आम आदमी 
उस तरफ मख़मल पे सोता है हर इक नौकर तेरा

सोच दिल पे हाथ रखकर ऐ वतन के नौजवां 
हादसों के बाद क्यों आता है नाम अक्सर तेरा

.

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 15, 2013 at 7:34am

उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई .. वाह वाह 

Comment by Sushil.Joshi on November 14, 2013 at 9:20pm

खूबसूरत प्रस्तुति है आ0 सुशील भाई जी...... हार्दिक बधाई....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 14, 2013 at 8:38pm

आदरणीय सुशील भाई , लाजवाब गज़ल कही है !!! ढेरों बधाई स्वीकार करें !!!

अम्न के दुश्मन ने फिर ओढ़ा है चाँदी का नक़ाब 
हो न जाये बेअसर इस बार भी पत्थर तेरा -वाह वाह! ये शेर बहुत बढ़िया लगा भाई !!!!!

(अंतिम शेर का अंतिम मिसरा एक बार और देख लें )

Comment by Neeraj Nishchal on November 14, 2013 at 7:37pm

मंदिरों में है बसेरा मस्जिदों में घर तेरा
ऐ परिन्दा बोल आख़िर कौन है रहबर तेरा ?

कोई जवाब नही आपकी इन पंक्तियों का
बहुत ही खूबसूरत ।

Comment by Abhinav Arun on November 14, 2013 at 7:25pm

रचना भावपूर्ण है , हार्दिक शुभकामनायें सुशील जी !!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 14, 2013 at 7:12pm

बेहतरीन  शुरुआत  i

रंग लाती है हिना पत्थर पे घिस जाने के बाद

प्रयास सराहनीय है

कृपया ध्यान दे...

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