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रख्त -ऐ -सफ़र तक़दीर

रख्त -ऐ -सफ़र  तक़दीर  को  कब  मिले  महोलत  घबरानेसे

अबस कुँजश्क तर्स खाये है इक आफताब के बेबक्त डूब जाने से

कटरा-ब -कतरा-ओ-गिरया हाथ  में लेकर दरया बनाता  हूँ 

जब  आती  है  पुर्सिश  गर्म  सांसोकी  खनक  तेरे  अफ़साने से

यह सबा ये फ़िज़ा-ओ-तहरतुष बुलाती है शायर-ऐ -फितरत  को

फिर मिलाती है दिल-ओ-दीद-ओ-जान आशिया कोई  बसाने को  

गर  वक़्त  ज़ालिम है तो तक़दीरभी  संग-ओ-दिल सनम है 

ऐसे जंगजू-ओ-हालातमें  कौन  बचाये  किसको तड़पानेसे से  

बा-गर्दिशे  आस्मां  में  सिमटी  चांदनी  बुला  रही  है मुझे

कैसे  केह दु आशिक़ी-ऐ-राज़  तेरे साज़-ओ-आवाज़ तरानेको

मुझे ले चलो उस मक़तल तक जहा मेरी गर्दन पड़ी है

मै भी देखु कैसे होती है सैर-ऐ-जन्नत फ़िराक तेरे आनेसे

अख्तर-शुमारिया कोई  सबक नहीं फान-ऐ-हिसाबदरी का

पर हम मी पढ़ाये  प्रीत दीलको तिजारत कि बातें जमानेसे

Posted by 'Preet'

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Views: 484

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Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 5:40am

अधिकांश उर्दू शब्दों से सुसज्जित इस प्रस्तुति के लिए बधाई आ0 प्रीति जी..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 2, 2013 at 9:50am

आदरणीया प्रीति जी इस मंच पर मौजूद ग़ज़ल की बातें नामक पोस्ट में ग़ज़ल से सम्बंधित वो तमाम जानकारियां मिल जायेंगी जो ग़ज़लगोई के लिये ज़रूरी है मेरा सुझाव है कि एक बार उस पेज पर भी ज़रूर जायेंl

Comment by विजय मिश्र on November 1, 2013 at 5:06pm
मोहतरमा ,बेशक एक खूबसूरत गज़ल ,आशिकी का जबरदस्त अक्स उभरा है और एक कसीस है जो आकिरी शे'र तक दिलोदिमाग को साथ-साथ घसीटती है . काबिलेतारीफ . साधुवाद और दीपावली की शुभकामना भी प्रीतिजी .

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