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अब मैं पराभूत नहीं

सांझ ढली

कुछ टूटा ,

भर गयी रिक्तता.

सब मूंद दिया कसकर.

अन्दर बाहर अब है,

एक रस.

घुप्प  अँधियारा.

दिवस का सब्जबाग,

छुप गया तमस के आवरण में.

धवल रश्मि, तुम्हारा सौंदर्य ...

अब है बेमोहक, बेमतलब , अर्थ हीन

अब मैं पराभूत नहीं,

 नहीं परावश...

नीरज कुमार ‘नीर’

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 530

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Comment by Sushil.Joshi on October 24, 2013 at 5:08am

बेहद सुंदर एवं गहन भाव लिए इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आ0 नीरज जी....

Comment by Neeraj Neer on October 20, 2013 at 11:25am

हार्दिक आभार जीतेंद्र गीत जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 20, 2013 at 10:34am

सुंदर सशक्त रचना, बहुत बहुत बधाई आदरणीय नीरज जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 19, 2013 at 11:28pm

भाई जी, आपने वास्तव में उन विन्दुओं की ओर साग्रह इंगित किया है जो इस मंच के उद्येश्य और स्वरूप के विपरीत है. खैर हम सभी रचनाकर्म के क्रम में पाठकधर्म भी निभायें. अन्यथा, रचनाकर्म पर सार्थक टिप्पणियाँ और परिचर्चा न कर परस्पर प्रसन्न करने के बेमतलब की आदत पाल लेंगे. इस पर फिर कभी.

सादर

Comment by Neeraj Neer on October 19, 2013 at 10:39pm

आदरणीय सौरभ जी .. हार्दिक हार्दिक आभार .. आपकी टिपण्णी ने हौसला दिया , आपने जिस तरह ध्यान पूर्वक पढ़कर कविता के मर्म को रेखांकित किया , मेरा लिखना सार्थक हुआ , वरना सुबह से तो लग रहा था    ... यह कविता निरर्थक ही रही  :) 

Comment by Neeraj Neer on October 19, 2013 at 10:34pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी हार्दिक आभार आपका.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 19, 2013 at 10:15pm

भाई नीरजजी, आपकी रचना ने वस्तुतः ध्यान आकर्षित किया है.

मानसिक निर्भरता का अचानक तिरोहित हो जाना क्षणिक असंतुलन का कारण अवश्य हुआ करता है लेकिन यह बन्धनमुक्तता जीवन के अग्रसरित पलों को सार्थकता भी देती है.
बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें, भाईजी.
शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 19, 2013 at 8:54pm

आदरणीय , नीरज भाई , सुन्दर रचना ,  आपको हार्दिक बधाई !!!

Comment by Neeraj Neer on October 19, 2013 at 8:41pm

आभार आदरणीय विजय मिश्र साहब ..

Comment by विजय मिश्र on October 19, 2013 at 5:28pm
हताश आशा और बिखरा असंयत मन . सुंदर नीरजी , बधाई

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