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रामभरोसे - (रवि प्रकाश)

थोथे सपने
उथली नींदें
स्वप्नलोक भी
रीता है।

सारा जीवन
कुरुक्षेत्र है
भूख हमारी
गीता है।

अट्टहास कर
रावण नाचे
बंधन में फिर
सीता है।

किसने सागर
पी डाला है
किसने अंबर
जीता है।

हम क्या जानें
वक़्त हमारा
रामभरोसे
बीता है।

मौलिक व अप्रकाशित।

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Comment by वेदिका on October 3, 2013 at 7:36pm

वाह वाह सुंदर भाव सुंदर सम्प्रेषण के लिए बधाई आ0 रविकर जी!!

Comment by बृजेश नीरज on October 3, 2013 at 7:32pm

आदरणीय रवि प्रकाश जी बहुत ही सुन्दर प्रवाहमय रचना! आपको ढेरों बधाई!

एक बात पूछना चाहता हूँ- आपने टैग्स में लिखा है- नवगीत. क्या ये नवगीत है? 

सादर!

Comment by रविकर on October 3, 2013 at 7:31pm

बढ़िया प्रवाह-
सुन्दर शब्द चयन-
गंभीर भाव-
सादर बधाइयां

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 3, 2013 at 5:47pm

वाह ! वाह अति उत्तम ! हार्दिक बधाई 

Comment by Ravi Prakash on October 3, 2013 at 4:21pm
धन्यवाद।आपकी सराहना से मन को उत्साह तथा प्रतिभा को बल मिला है।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 3, 2013 at 3:24pm

बहती हुई शानदार रचना के लिए सादर बधाई  स्वीकार करीं रवि जी 

Comment by राजेश 'मृदु' on October 3, 2013 at 2:46pm

बहुत सुंदर, इस रचना में प्रवाह भी है, मर्म भी, व्‍यंग्‍य भी, सादर

Comment by coontee mukerji on October 3, 2013 at 1:47pm

वाह रवि प्रकाश जी , एक एक शब्द में सत्य और व्यंग्य छिपी है. अति सुंदर.

Comment by Ravi Prakash on October 3, 2013 at 12:06pm
धन्यवाद।
Comment by अरुन 'अनन्त' on October 3, 2013 at 11:41am

वाह वाह वाह अत्यंत सुन्दर प्रवाहमयी खूबसूरत प्रस्तुति भाई बधाई स्वीकारें.

कृपया ध्यान दे...

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