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           ग़ज़ल

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कैसा      भाईचारा     जी

रख दो  माल  हमारा  जी .

 

दिल का क्या कहना मानें

दिल  तो  है  आवारा  जी  .

 

शीशा तोड़ा,  क्या तोड़ा ?

तोड़ो  तम की  कारा  जी .

 

माल  अकेले  गपक गये 

तुम  सारे  का  सारा  जी .

 

जाओ,  कूद पड़ो  रण में

दुश्मन ने  ललकारा  जी .

 

पेट भरेगा किस-किस का

सबका   पालनहारा   जी .

 

कोई     चिनगारी     ढूँढो

गहरा  है  अंधियारा   जी .

 

मैं  होता   तो   कर   देता

कब  का  वारा-न्यारा  जी .

 

किस  पर  जान  लुटायेंगे

कौन है  तुमसे  प्यारा जी .

अब अपना क्या परिचय दूँ

मैं   बे-घर   बनजारा   जी

 

         [[[[[[[]]]]]]]

 

š                   -- 'आकाश'

 

       [मौलिक/अप्रकाशित]

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Comment by Dr.Prachi Singh on October 1, 2013 at 6:24pm

आदरणीय अजीत शर्मा जी 

छोटी बहर पर सहज सरल प्रस्तुति आकर्षित करती है.. और रदीफ़ भी 'जी' प्रभावशाली है... बधाई स्वीकारें 

यदि आपने बहर// २ २    २ २    २२    २ // ली है तो कई मिसरे बेबहर हो रहे हैं. एक बार पुनः गौर करें 

मतले में इता दोष है व चिंगारी वाले शेर में तकाबुले रदीफ़ का ऐब बन रहा है 

Comment by विजय मिश्र on October 1, 2013 at 4:59pm
सरस और सुंदर , फक्करों सा सूफियाना अन्दाज लिए एक मस्त रचना .बधाई हो बन्धु .
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 1, 2013 at 2:12pm

बहुत सुन्दर आदरणीय

शीशा तोड़ा,  क्या तोड़ा ?

तोड़ो  तम की  कारा  जी . वाह क्या बात है

Comment by ram shiromani pathak on October 1, 2013 at 12:20pm

शीशा तोड़ा,  क्या तोड़ा ?

तोड़ो  तम की  कारा  जी .//////वाह बहुत खूब 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल भाई आका जी //हार्दिक बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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