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रोज़ा, नमाज़, हज औ तिलावत न कर सका

रोज़ा, नमाज़, हज औ तिलावत न कर सका
अपने वजूद की मैं हिफाज़त न कर सका

दैरो हरम में आ के तो सजदा किया ज़रूर
लेकिन कभी मैं दिल से इबादत न कर सका

बिकता रहा ज़मीर भी कौड़ी के भाव में
मैं चाहकर भी इसकी हिफ़ाज़त न कर सका

तेरे क़दम भी रुक गए उल्फत की राह में 

मै भी अकेला घर से बग़ावत न कर सका

तेरे बदन में देखकर पाकीज़गी की आग 
कोई भी शख्स छूने की ज़ुर्रत न कर सका

मैख़ाने में गुज़ार दी 'साहिल' ने सारी उम्र
साक़ी के दिल पे फिर भी हुकूमत न कर सका

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by राजेश 'मृदु' on September 4, 2013 at 6:04pm

सुंदर कहन, प्रस्‍तुति बहुत अच्‍छी लगी, सादर

Comment by vijay nikore on September 4, 2013 at 1:44pm

गज़ल अच्छी बनी है। बधाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by Meena Pathak on September 4, 2013 at 9:52am

बहुत ग़ज़ल .. बधाई स्वीकारें

Comment by AVINASH S BAGDE on September 3, 2013 at 8:43pm

तेरे क़दम भी रुक गए उल्फत की राह में 

मै भी अकेला घर से बग़ावत न कर सका..wah!

Comment by AVINASH S BAGDE on September 3, 2013 at 8:42pm

दैरो हरम में आ के तो सजदा किया ज़रूर 
लेकिन कभी मैं दिल से इबादत न कर सका...wah!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 3, 2013 at 8:28pm

तेरे बदन में देखकर पाकीज़गी की आग 
कोई भी शख्स छूने की ज़ुर्रत न कर सका----इस शेर ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है ,बहुत बढिया ग़ज़ल कही है सुशील जी दिल से बधाई आपको 

Comment by बृजेश नीरज on September 3, 2013 at 6:53pm

इस रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई!

Comment by annapurna bajpai on September 3, 2013 at 4:38pm

अति सुंदर गज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय । 

Comment by Shyam Narain Verma on September 3, 2013 at 3:07pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by विजय मिश्र on September 3, 2013 at 2:35pm
मित्र गिरिराजजी ! पूरी गजल में मुझे इसी मिसरे के अश'आर से शिकायत थी ,दिल ही दिल में ,आपने इसकी ही तारीफ़ कर दियी . हालात कितने भी ब्द से बदतर क्यूँ न हो जाएँ ,इंसानी तौर पर हमें अपने जमीर पर आखिरी साँस तक कायम रहना चाहिए . यही बस इंसानियत की पहचान और उसका सरमाया है . जिंदगी की ल्ज्ज्तें महफूज रहतीं हैं .

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