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तुम सोई

सपनों में खोई

अधर मंद मुस्काते हैं

ये सपने

चुपके से आकर

आखिर क्या कह जाते हैं।

 

बागों में

चंपा महकी है

मंद हवा

बहकी बहकी है

घनी रात को, तारे आकर

रूप नया दे जाते हैं।

 

रंग भरे

यह श्वेत चांदनी

कण कण में

इक मधुर रागिनी

नींद भरे बोझिल ये नयना

सुध बुध सब हर जाते हैं।

.

 - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 959

Comment

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Comment by annapurna bajpai on August 24, 2013 at 6:17pm
adarniy brijesh ji sundar navgeet uttam bhavon ke sath sampreshit hai . apko hardik badhai .

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 24, 2013 at 6:04pm

 सुन्दर नवगीत भाई बृजेश !! हार्दिक बधाई भाई जी !!

Comment by बृजेश नीरज on August 24, 2013 at 5:46pm

आदरणीया मीना जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on August 24, 2013 at 5:45pm

आदरणीय नीरज भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on August 24, 2013 at 5:44pm

आदरणीया वंदना जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Meena Pathak on August 24, 2013 at 5:30pm

बहुत सुन्दर रचना .. हार्दिक बधाई 

Comment by Neeraj Neer on August 24, 2013 at 4:40pm

बहुत बेहतरीन बृजेश भाई ,,

Comment by Vindu Babu on August 24, 2013 at 3:42pm
सुन्दर नवगीत रचा है आदरणीय।
सादर बधाई स्वीकारें!
Comment by बृजेश नीरज on August 24, 2013 at 2:36pm

आदरणीया विनीता जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Vinita Shukla on August 24, 2013 at 2:32pm

शब्दों की सुंदर बुनावट तथा सार्थक अभिव्यक्ति. इस  भावयुक्त रचना पर, बहुत बहुत बधाई.

कृपया ध्यान दे...

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