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सहरा में कहीं खो जायें न हम, आवाज़ हमें देते रहना ।
नयी राहों का नयी मंजिल का, आगाज़ हमें देते रहना ।

माना कि उदासी के सायें कभी हमको घेर भी लेते हैं ,
खुश रहकर जीने का अपना, अन्दाज़ हमें देते रहना ।

जब गिरने लगे ये तनहा मन घनघोर निराशा के तल में,
ऐसे में अपनी उल्फत की, परवाज़ हमें देते रहना ।

भावों की लहर जब उठती है, शब्दों के शहर बह जाते हैं ,
वो प्यार सहेजने को अपने, अल्फ़ाज़ हमें देते रहना ।

जो दिल में हमारे रहती है  हम सब तुमसे कह जाते हैं ,
प्रियतम तुम भी अपने दिल के, हर राज़ हमें देते रहना ।

जीवन के फसानों से गुज़रे, जो दिल के तरानों से गुज़रे ,
वो गीत हमें देते रहना , वो साज हमें देते रहना ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज

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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on August 18, 2013 at 4:36pm

नीरज भाई बहुत खूब सभी अशआर पसंद आये किन्तु मैं बहर में उलझ गया हूँ कृपया बहर से अवगत करायें :

सहरा में कहीं खो जायें न हम, आवाज़ हमें देते रहना ।
नयी राहों का नयी मंजिल का, आगाज़ हमें देते रहना ।

सहरा 22 

नयी 12 .. भाई शुरू में ही उलझ गया सह को गिराकर लघु नहीं कर सकते और न को दीर्ध नहीं पढ़ सकते ? यह मेरा मानना है

बहरहाल प्रस्तुति पर बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 18, 2013 at 3:51pm

नीरज भाई , बहतरीन गज़ल हुई भाई , वाह वाह !!

भावों की लहर जब उठती है, शब्दों के शहर बह जाते हैं ,
वो प्यार सहेजने को अपने, अल्फ़ाज़ हमें देते रहना । ------------- क्या बात है !!

कृपया ध्यान दे...

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