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ग़ज़ल : हुई है सभ्यता गायब

बहर : हज़ज़ मुरब्बा सालिम

......... १२२२, १२२२ .........

अलग बेशक हुए मजहब,

सभी का एक लेकिन रब,

नज़र में एक से उसके,

भिखारी हो भले साहब,

जिसे जितनी जरुरत है,

दिया उसको उसे वो सब,

सभी को एक सी शिक्षा,

खुदा का बाँटता मकतब,

(मकतब : विद्यालय)

मुसीबत में पुकारे जो,

चले आयें बने नायब,

(नायब : सहायक)

अजब ये दौर आया की,

हुई है सभ्यता गायब...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by ram shiromani pathak on July 26, 2013 at 8:58pm

वाह  बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय भाई अरुण जी  //हार्दिक बधाई आपको 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on July 26, 2013 at 7:43pm

बढ़िया ग़ज़ल भाई अरुण जी
दाद क़ुबूल कीजिये.....

Comment by Sarita Bhatia on July 26, 2013 at 7:08pm

बहुत खूब अरुण ,बधाई स्वीकारें 

Comment by Ketan Parmar on July 26, 2013 at 4:35pm

मुसीबत में पुकारे जो,

चले आयें बने नायब,

(नायब : सहायक)

Umdaa baat hai bhai ji dil se daad kabul kare

Comment by Ketan Parmar on July 26, 2013 at 4:33pm

वाह! खूबसूरत गज़ल

Comment by शुभांगना सिद्धि on July 26, 2013 at 2:16pm

वाह! खूबसूरत गज़ल  

Comment by विजय मिश्र on July 26, 2013 at 1:35pm
अरुणजी ,दाद कबूलें . मजा आ गया पढकर .क्या खास है ? समझ से परे मगर बेहतरीन है ,नायाब है ,मन में आनंद भरती है .
Comment by sanju shabdita on July 26, 2013 at 1:20pm

aadarniya arun ji bahut hi shandar ghazal .....bahut badhaie.

Comment by वेदिका on July 26, 2013 at 11:53am

जिसे जितनी जरुरत है,
दिया उसको उसे वो सब,,,, में न जाने क्यों कुछ असहज लगा मुझे|

अजब ये दौर आया की,
हुई है सभ्यता गायब..,, बहुत खूब शेअर, वाह!!

दिली दाद लीजिये आदरणीय अरुण जी!

Comment by Shyam Narain Verma on July 26, 2013 at 11:47am
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………

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