For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

एक प्रेमिका की अभिव्यक्ति

अब क्यूँ अपना रूप सजाऊं ,किसके लिए सिंगार करूँ .
दिल का गुलशन उजड़ गया तो ,फिर से क्यूँ गुलज़ार .
जब से गए -तन्हाई में मैं ,तुमको ही सोचा करती हूँ .
देख न ले कोई अश्क हमारा ,छिप -छिप रोया करती हूँ .
प्यार भी अपना -गम भी अपना ,क्यों इसका इज़हार करूँ .
दिल का -------------------------------------------
शीशा जैसे टूट गए जो, माना की वो सपने थे .
सच है आज पराये हो गए, पर कल तक तो अपने थे .
आज भी याद है कल की बातें, क्यों इससे इनकार करूँ .
दिल का -------------------------------------------
कोई गिला ना- शिकवा कोई, ना तुम पर कोई तोहमत है .
ज़ख्म मिला जो प्यार में हमको,अब उससे ही उल्फत है .
दर्द ही मर्ज़ है -दर्द दवा है, दूजा क्या उपचार करूँ .
दिल का -------------------------------------------
समाप्त
गीतकार -सतीश मापतपुरी
मोबाइल -9334414611

Views: 391

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 19, 2010 at 8:31pm
कोई गिला ना- शिकवा कोई, ना तुम पर कोई तोहमत है .
ज़ख्म मिला जो प्यार में हमको,अब उससे ही उल्फत है ,
वाह सतीश भइया वाह , ग़ज़ब की ये लाइन है, बहुत सही, यही तो सच्चा प्यार है, प्यार मे मिले जख्म भी सिने से लगाने को जी चाहता है, शायद यही प्यार है, एक अच्छीरचना दिया है सतीश भाई, बहुत बढ़िया,
Comment by Babita Gupta on May 19, 2010 at 12:13pm
अब क्यूँ अपना रूप सजाऊं ,किसके लिए सिंगार करूँ .
दिल का गुलशन उजड़ गया तो ,फिर से क्यूँ गुलज़ार .
जब से गए -तन्हाई में मैं ,तुमको ही सोचा करती हूँ .
देख न ले कोई अश्क हमारा ,छिप -छिप रोया करती हूँ .
प्यार भी अपना -गम भी अपना ,क्यों इसका इज़हार करूँ .
Aek achhi rachna hai, mapatpuri jee ka open books par aayey pahaley ki bhi rachnayey mainey padha hai sabhi achhi rachnayey hai,
Comment by Admin on May 18, 2010 at 12:21pm
शीशा जैसे टूट गए जो, माना की वो सपने थे .
सच है आज पराये हो गए, पर कल तक तो अपने थे .

सतीश जी, बहुत ही खूबसूरती से इस रचना को आप ने सजाया है, एक प्रेमिका की अभिव्यक्ति , बहुत सुंदर है, सब समय की बात है, कभी बेगाने भी अपने हो जाते है और कभी अपने भी बेगाने हो जाते है,बहुत बहुत धन्यवाद इस पोस्ट के लिये,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on May 17, 2010 at 10:46pm
अब क्यूँ अपना रूप सजाऊं ,किसके लिए सिंगार करूँ .
दिल का गुलशन उजड़ गया तो ,फिर से क्यूँ गुलज़ार .
जब से गए -तन्हाई में मैं ,तुमको ही सोचा करती हूँ .
देख न ले कोई अश्क हमारा ,छिप -छिप रोया करती हूँ .
bahut hi badhiya rachna hai satish jee......is rachna par main jyada kuch nahi likh sakta isliye bas itna hi kahunga ki bahut hi badhiya hai...........

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
5 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
yesterday
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service