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ग़ज़ल - आया था लुत्फ़ लेने नवाबों के शह्र में

आया था लुत्फ़ लेने नवाबों के शह्र में

हैरतज़दा खड़ा हूँ नक़ाबों के शह्र में

आलूदा है फज़ाए बहाराँ भी इस क़दर

खुशबू नहीं नसीब गुलाबों के शह्र में

तहज़ीबे कोहना और तमद्दुन नफासतें

आया हूँ सीखने में नवाबों के शह्र में

ऐसी हसीं वरक़ को यहाँ देखता है कौन

हर सम्त जाहेलां है किताबों के शह्र में

बेहोश होने का न गुमां हमको हो सका

हर शख्स होश में है शराबों के शह्र में

चेहरे पे सादगी है तो जुल्फें सुफैद हैं

ये कौन आ गया है खिज़ाबों के शह्र में

अल्लाह वाले खौफज़दा होते ही नहीं

नेकी के शहर में, न अज़ाबों के शह्र में

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Sushil Thakur on July 5, 2013 at 8:10am

thanks everybody

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on July 5, 2013 at 6:47am

चेहरे पे सादगी है तो जुल्फें सुफैद हैं

ये कौन आ गया है खिज़ाबों के शह्र में-- मज़ा आगया। शानदार ग़ज़ल के लिए आदरणीय शाहिल जी को बधाई 

Comment by सानी करतारपुरी on July 4, 2013 at 11:24pm

सुशील जी  .. बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है .. बढ़िया अशआर .. मुबारक

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