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ग़ज़ल:-हूरों की तस्वीरें

ग़ज़ल
होटल वाली खीरें अच्छी लगती हैं
हूरों की तस्वीरें अच्छी लगती हैं |

अपने घर के गमले सारे सूखे हैं
औरों की जागीरें अच्छी लगती हैं|

शहरों में है लिपे पुते चेहरों की भींड
गावों वाली हीरें अच्छी लगती हैं |

मुझे बनावट वाले ढेरों रिश्तों से
यादों की जंजीरें अच्छी लगती हैं |

अपनी खुशियों में अब कम खुश होते लोग
पड़ोसियों की पीरें अच्छी लगती हैं |

लुटे-पिटे इस लोकतंत्र में अब तो बस
किस्मत की लकीरें अच्छी लगती हैं |

खद्दर वाले खैर मनाएं बस अपनी
अब किसको तकरीरें अच्छी लगती हैं |

आम आदमी का हक मारा जाता है
तब खूनी शमशीरें अच्छी लगती हैं |

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on December 2, 2010 at 10:28am
जी नवीन वहाँ भी रौनक खूब है बधाई
Comment by Abhinav Arun on December 1, 2010 at 3:10pm
श्री बबन जी ,भाई नवीन जी और मधुरम जी आप सबकी प्रतिक्रिया का आभारी हूँ कोई पढ़े तो लिखना सार्थक होता है|और पढ़ कर राय दे तो दिल हरा भरा garden garden ho jata है|
Comment by baban pandey on December 1, 2010 at 8:35am
मुझे बनावट वाले ढेरों रिश्तों से
यादों की जंजीरें अच्छी लगती हैं //
वाह अरुण भाई वाह //
Comment by Madhuram Chaturvedi on November 30, 2010 at 7:13pm
मुझे बनावट वाले ढेरों रिश्तों से
यादों की जंजीरें अच्छी लगती हैं |

वाकई मैं बनावटी रिश्तों से यादों की जंजीरें कई गुना अधिक अच्छी होती हैं , बहुत ही अच्छा लिखा हैं आपने

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