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बस यूँ ही.....काश ये हलके होते.....

बस यूँ ही.....काश ये हलके होते.....

 

बचपन के सपने

खुली आँखों के सपने

खुला आकाश 

आज़ाद पंछी

बहुत से उड़ गए

कुछ सफ़र पूरा कर

वापस पलकों पर आ गए 

 

और अब...

बंद आँखों में नींद कंहा

नींद कभी आई तो

सपने कंहा

कभी आये तो

उड़े कंहा,आकाश कंहा

 

जरूरतों के पिंजरे में कैद 

कभी निकले तो

ज़रा फडफडाये

पर मजबूरियों के पत्थर 

वक्त के हाथों में हमेशा दिखे 

और निशाना भी पक्का 

उड़ने से पहले ही लगे

 

पंछी फिर फडफडाये,गिरे

आज भी उन पत्थरों के नीचे दबे हैं 

काश , ये पत्थर जरा हलके होते तो

शायद ,छटपटाते ,हिलते हिलाते 

नीचे से निकल आते अधमरे से 

मगर सपने तो पंछी थे 

ये पत्थर तो पत्थर ही हैं

काश ये जरा हलके होते ..........पवन अम्बा ...

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

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Comment

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Comment by pawan amba on March 16, 2013 at 9:39am

 Saurabh Pandey ji...guru jano se mila ek ek comnt mere liye prasaad ki tarah hi hota hai......mai private service mei hun aur mujhe samaye bahut km mil pata hai........jitna bhi milta hai pura prayaas hota hai ki aap sb se kuch seekh saku.....dil se aabhaar aap sb kaa aur is group kaa.....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 8:14am

निर्दोष सपनों पर सांसारिक रौद्र विसंगति का वातावरण बनाता है. उनके संदर्भ में कुछ कहना अच्छा लगा है.. .

शुभ-शुभ

Comment by pawan amba on March 15, 2013 at 4:53pm

Yogi Saraswat JI....by Laxman Prasad Ladiwala JI....Dr. Swaran J. Omcawr JI....आप  सब का दिल  से हार्दिक धन्यवाद......

Comment by pawan amba on March 15, 2013 at 4:51pm

आप  सब का दिल  से हार्दिक धन्यवाद .... Dr.Prachi Singh JI....

Comment by pawan amba on March 15, 2013 at 4:50pm

 ram shiromani pathak JI....बृजेश कुमार सिंह (बृजेश नीरज) JI  आप  सब का दिल  से हार्दिक धन्यवाद ....

Comment by Dr. Swaran J. Omcawr on March 15, 2013 at 12:04pm

Behad Khoobsurat

Swaran

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 14, 2013 at 2:26pm

सपनो को मध्यम बना वर्तमान छटपटाते जीवन पर सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई श्री पवन अम्बा जी 

Comment by Yogi Saraswat on March 14, 2013 at 12:15pm

जरूरतों के पिंजरे में कैद 

कभी निकले तो

ज़रा फडफडाये

पर मजबूरियों के पत्थर 

वक्त के हाथों में हमेशा दिखे 

और निशाना भी पक्का 

उड़ने से पहले ही लगे

सुन्दर अभिव्यक्ति


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 14, 2013 at 10:46am

हालात और ज़रूरतें मासूम सपनों को कैसे रौंद डालते हैं...ये छटपटाहट सुन्दरता से अभिव्यक्त हुई है

हार्दिक बधाई  

Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 9:40pm

//काश , ये पत्थर जरा हलके होते तो

शायद ,छटपटाते ,हिलते हिलाते 

नीचे से निकल आते अधमरे से //

बहुत ही सुन्दर! अप्रतिम! आपने जो चित्र खींचा है आंखों से होता हुआ दिल में उतर गया।
सादर!

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