For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - जिससे सब घबरा रहे हैं ...- वीनस

हज़रात,
एक और ताज़ा ग़ज़ल आपकी मुहब्बतों के हवाले कर रहा हूँ, लुत्फ़ लें .....
-
-

जो ये जानूं, मुख़्तसर हक आप पर मेरा भी है |
तब तो समझूं, मुन्तज़िर हूँ, मुन्तज़र मेरा भी है |


जिससे सब घबरा रहे हैं वो ही डर मेरा भी है |
शहर में दंगे की ज़द में एक घर मेरा भी है |

घरघराती आरियों में दब गई थी हर सदा, 
कुछ कबूतर कह रहे थे,,, पर शज़र मेरा भी है |

आखिरश नंगी हकीकत से हुआ है सामना,    
आइना खुश था कि पत्थर पे असर मेरा भी है |

 

आसमां वालों ! मिलेगा जा-ब-जा तुमको जवाब,
तुम से टकराना पड़ा तो, बालोपर मेरा भी है |

इश्क में हद से गुज़र जाने को वो तय्यार हैं, 
और ऐसा ही इरादा अब इधर मेरा भी है |

वक्त तो ये चाहता था, झुक के मैं उससे कहूँ,
''आसमां इक चाहिए मुझको कि सर मेरा भी है |''

तज्रिबा ही काम आया ज़िन्दगी के मोड पर,
पर मेरे सब दोस्त कहते हैं हुनर मेरा भी है |

रहगुज़र मंजिल हुई, अब मंजिलें हैं रहगुज़र,
वो जो सबका राहबर है राहबर मेरा भी है |


खुद को समझे बिन किसी को क्या समझ पाऊंगा मैं,
इसलिए अब खुद से खुद का इक सफ़र मेरा भी है |



=============================================

मुख़्तसर - थोडा सा, इकाई का एक टुकड़ा 
मुन्तजिर - प्रतीक्षारत, इंतज़ार करने वाला
मुन्तज़र - जिसकी प्रतीक्षा हो, इंतज़ार करवाने वाला
बालोपर - सामर्थ्य


मौलिक, अप्रसारित व अप्रकाशित
- वीनस केसरी

Views: 603

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by वीनस केसरी on March 16, 2013 at 11:12pm

सौरभ जी,
हार्दिक आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 12:01am

वीनस भाई.. . क्या ग़ज़ल हुई है.

अभी थोड़ी देर पहले डॉक्टर साहब को वाह-वाह कर आया हूँ.. . अब आपको हर शेर पर वाह-वाह कह रहा हूँ.. .

बार बार बधाई.. हर शेर पर बधाई.. . मगर इन शेरों पर एक्स्ट्रा.. खूब-खूब-खूब बधाई लें -

घरघराती आरियों में दब गई थी हर सदा,
कुछ कबूतर कह रहे थे,,, पर शज़र मेरा भी है |

इश्क में हद से गुज़र जाने को वो तय्यार हैं,
और ऐसा ही इरादा अब इधर मेरा भी है |

खुद को समझे बिन किसी को क्या समझ पाऊंगा मैं,
इसलिए अब खुद से खुद का इक सफ़र मेरा भी है |

इस ग़ज़ल को सामने बैठ कर सुनने का मज़ा अभी पढ़ने पर फिर से आ रहा है.. .

Comment by वीनस केसरी on March 13, 2013 at 2:51pm

आप सभी का हार्दिक आभार

स्नेह बनाये रखें ....

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 13, 2013 at 9:34am

तज्रिबा ही काम आया ज़िन्दगी के मोड पर, 
पर मेरे सब दोस्त कहते हैं हुनर मेरा भी है |माननीय श्री वीनस केसरी जी, सुप्रभात! सादर प्रणाम!!दूरियों और कशिश  को झकझोर देने वाली गजल..वाह.वाह..! बहुत.बहुत बधाई

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on March 13, 2013 at 7:16am

वाह वाह आदरणीय वीनस सर जी ............वाह

क्या बात है बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल कही है

हर इक अशआर उम्दा है अपने आप में नगीना है

इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद क़ुबूल फरमाइए साहब

जय हो

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 12, 2013 at 8:29pm

क्या बात है वीनस भाई इक ही ज़मीन पर दोनों ने एक साथ ही ग़ज़ल पोस्ट की ....बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है...खासकर ये शेर बहुत उम्दा हुआ है:

इश्क में हद से गुज़र जाने को वो तय्यार हैं,  
और ऐसा ही इरादा अब इधर मेरा भी है |...

दिली दाद कुबूल करें !

 

Comment by ram shiromani pathak on March 12, 2013 at 5:35pm

जिससे सब घबरा रहे हैं वो ही डर मेरा भी है |
शहर में दंगे की ज़द में एक घर मेरा भी है |

 खूबसूरत गज़ल के लिए ढेरों दाद...................

Comment by राजेश 'मृदु' on March 12, 2013 at 5:28pm

वक्त तो ये चाहता था, झुक के मैं उससे कहूँ,
''आसमां इक चाहिए मुझको कि सर मेरा भी है |''  खूबसूरत गज़ल के लिए ढेरों दाद

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहावलीः अपना भारत एक है, यहाँ विविध आचार । गाँवों मे जब बाढ़ है, शहर होत व्यापार ।। अनेक प्रदेश…"
2 hours ago
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

गीत - पर घटाओं से ही मैं उलझता रहा

 रात के हुस्न  पर थी  टँकी चाँदनीपर घटाओं से ही मैं उलझता रहा चाँद पाने की कोशिश नहीं थी मगरचाँद…See More
3 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"राजनीति के रंग की, बहुत खूब यह चित्र।गहराई समझा रहा, हम सब को ओ!मित्र।१।*हर बस्ती के घाट को, देख…"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"सादर अभिवादन।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"सादर अभिवादन।"
7 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम !! "
8 hours ago
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
11 hours ago
Samar kabeer commented on Mamta gupta's blog post गजल
"मुहतरमा ममता गुप्ता जी आदाब, इससे पहले भी कमेंट किया था जो आपकी ग़लती से डिलीट हो गया । ग़ज़ल का…"
19 hours ago
Mamta gupta commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल : मिज़ाज़-ए-दश्त पता है न नक़्श-ए-पा मालूम
"अच्छी ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें आदरणीय"
20 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक .. इच्छा , कामना, चाह आदि
"आदरणीय समर कबीर जी आदाब सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर "
20 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक .. इच्छा , कामना, चाह आदि
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । सहमत एवं संशोधित । "
20 hours ago

© 2024   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service