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शब्दों में एक ज्वाला भर लो ,
लड़ने को अब कमर कस लो !
दुर्दशा पर चटखारे ना ले कोई ,
इतना खुद को सशक्त कर लो !!

शायद डर से गुमराह हो ,
अपना रास्ता खुद ही चुन लो !
इस हाल के ज़िम्मेदार है जो ,
उनसे अब दो दो हाँथ कर लो !!

यदि सहना है उत्पीडन इनका ,
यूँ ही खुद को बदनाम कर लो!
पड़े रहो मुर्दों की तरह,
खुद को इनका गुलाम कर लो!!

लड़ नहीं सकते जब तुम ,
कायर सा फिर जीना क्यूँ !
तिल तिल कर मरने से अच्छा ,
खुद का ही काम तमाम कर लो !!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by upasna siag on January 24, 2013 at 4:10pm

लड़ नहीं सकते जब तुम ,
कायर सा फिर जीना क्यूँ !
तिल तिल कर मरने से अच्छा ,
खुद का ही काम तमाम कर लो .......सही कहा आपने 

Comment by ram shiromani pathak on January 20, 2013 at 12:41pm

हार्दिक धन्यवाद् अरुन शर्मा "अनन्त"  जी आपका 

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 20, 2013 at 11:02am

दीपक जी बेहद सशक्त रचना हार्दिक बधाई, अब इन सब की खास जरुरत आन पड़ी है.

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