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में  दरिया हूँ

प्यार हर दिल के अंदर  ढूढता हूँ

नहीं कोई मेरा अपना ठिकाना

मगर घर सबको सुन्दर  ढूढता हूँ

टूट जाते हे जब सपने महल के

पिटे खुआबो में खंडहर  ढूढता हूँ

भरा दहशत अंदेशो से जमाना

में चेनो अमन के मंजर  ढूढता हूँ

नहीं आंधी तूफानों का भरोसा

हरेक कश्ती को लंगर  ढूढता हूँ

सफाया के सके जो दुश्मनों का

में इक ऐसा सिकंदर  ढूढता हूँ

में  दरिया हूँ समुंदर ढूढता हूँ

डॉ अजय आहत

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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on December 16, 2012 at 1:14pm

संदीप भाई की तरह मैं भी कहूँगा बहुत खूब अच्छा प्रयास बधाई स्वीकारें

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 16, 2012 at 11:08am

बहुत खूब जुस्तजू है आपकी सर जी बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 15, 2012 at 11:33pm

आप अत्यंत भाग्यशाली हैं, आहत जी.

शुभेच्छाएँ.

Comment by Anwesha Anjushree on December 15, 2012 at 4:29pm

Mrigmarichika....

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