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विशेष लेख- भारत में उर्दू : संजीव 'सलिल'

विशेष लेख-

भारत में उर्दू :


संजीव 'सलिल'

*

भारत विभिन्न भाषाओँ का देश है जिनमें से एक उर्दू भी है. मुग़ल फौजों द्वारा आक्रमण में विजय पाने के बाद स्थानीय लोगों के कुचलने के लिये उनके संस्कार, आचार, विचार, भाषा तथा धर्म को नष्ट कर प्रचलित के सर्वथा विपरीत बलात लादा गया तथा अस्वीकारने पर सीधे मौत के घाट उतारा गया ताकि भारतवासियों का मनोबल समाप्त हो जाए और वे आक्रान्ताओं का प्रतिरोध न करें. यह एक ऐतिहासिक सत्य है जिसे कोई झुठला नहीं सकता. पराजित हतभाग्य जनों को मुगल सिपाहियों ने अरबी-फ़ारसी के दोषपूर्ण रूप (सिपाही शुद्ध भाषा नहीं जानते थे) को स्थानीय भाषा के साथ मिलावट कर बोला. उनके गुलामों को भी वही भाषा बोलने के लिये विवश होना पड़ा.


भारतीयों को भ्रान्ति है कि उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्र या राजकीय भाषा है जबकि यह पूरी तरह गलत है. न्यूज़ इंटरनॅशनल के अनुसार लाहौर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ख्वाजा मुहम्मद शरीफ ने १३ अक्टूबर २०१० को एक परमादेश याचिका को इसलिए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता सना उल्लाह और उसके वकील यह प्रमाणित करने में असफल हुए कि उर्दू पाकिस्तान की सरकारी काम-काज की भाषा है. याचिकाकर्ता ने दवा किया था कि १९४८ में पाकिस्तान के राष्ट्रपिता कायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्ना ने ढाका में विद्यार्थियों को सम्बोधत करते हुए उर्दू को पाकिस्तान की सरकारी काम-काज की भाषा बताया था तथा संविधान में भी एक निर्धारित समयावधि में ऐसा किये जाने को कहा गया है लेकिन पाकिस्तान की आज़ादी के ६२ साल बाद तक ऐसा नहीं किया गया.


हरकादास वासन, लीड्स अमेरिका के अनुसार-- ''उर्दू संसार की सर्वाधिक खूबसूरत भाषा है जिसे बोलते समय आप खुद को दुनिया से ऊँचा अनुभव करते है तथा इसे भारत की सरकारी काम-काज की भाषा बनाया जाना चाहिए.वासन के अनुसार उर्दू अरबी-फारसी प्रभाव से हिन्दी का उन्नत रूप है. तुर्की मूल के शब्द 'उर्दू' का अर्थ सेना या तंबू है. उर्दू ने व्यावहारिक रूप से हिन्दी की शब्दवाली को उसी तरह दोगुना किया है जैसे फ्रेंच ने अंग्रेजी को. उर्दू ने भारतीय कविता विशेषकर श्रंगारिक कविता में बहुत कुछ जोड़ा है. मेहरबानी तथा तशरीफ़ रखिए जैसे शब्द उर्दू के हैं.'' उर्दू की एक खास नजरिये से की जा रही इस पैरवी के पीछे छिपी भावना छिपाए नहीं छिपती. हिन्दी को कमतर और उर्दू को बेहतर बताने का ऐसा दुष्प्रयास उर्दूदां अक्सर करते रहे हैं औए इसी कारण हिन्दी व्याकरण और पिंगल के आधार पार रची गयी गजलों को खारिज करते रहे हैं जबकि खुद हर्फ़ गिराकर लिखे गये दोषपूर्ण दोहे थोपते आये हैं.


वस्तुतः उर्दू एक गड्ड-मड्ड भाषा या यूँ कहें कि हिन्दी भाषा ही एक रूप है जो अरबी अक्षरों से लिखी जाती है. भाषा विज्ञान के अनुसार उर्दू वास्तव में एक भाषा है ही नहीं. फारस, अरब तथा तुर्की आदि देशों के सिपाहियों की मिश्रित बोली ही उर्दू है. किसी पराजित देश में विजेताओं की भाषा का प्रयोग करने की प्रवृत्ति होती है. इसी कारण भारत में पहले उर्दू तथा बाद में अंग्रेजी बोली गयी. उर्दू तथा अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार तथा हिन्दी की उपेक्षा के पीछे अखबारी समाचार माध्यम तथा प्रशासनिक अधिकारियों की महती भूमिका है.व्यक्ति चाहें भी तो भाषा को प्रचलन में नहीं ला सकते जब तक कि अख़बार तथा प्रशासन न चाहें.


उर्दू का सौन्दर्य विष कन्या के रूप की तरह मादक किन्तु घातक है. उर्दू अपने उद्भव से आज तक मुस्लिम आक्रमणकारियों और मुस्लिम आक्रामक प्रवृत्ति की भाषा है.८० से अधिक वर्षों तक उर्दू उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम भारत की सरकारी काम-काज की भाषा रही है किन्तु यह उत्तर तथा हैदराबाद के मुसलमानों को छोड़कर अन्य वर्गों (यहाँ तक कि मुसलमानों में भी)में अपनी जड़ नहीं जमा सकी. अंग्रेजी राज्य में उत्तर भारत में उर्दू शिक्षण अनिवार्य किये जाने के कारण पुरुष वर्ग उर्दू जान गया था किन्तु घरेलू महिलाएँ हिन्दी ही बोलती रहीं.यहाँ तक कि केवल ५०% मुसलमान ही उर्दू को अपनी मातृभाषा कहते हैं. मुसलमानों की मातृभाषा बांगला देश में बंगाली, केरल मे मलयालम, तमिलनाडु में तमिल आदि हैं. यह भी सत्य है कि मुसलमानों की धार्मिक भाषा उर्दू नहीं अरबी है. आरम्भ में मुस्लिम लीग ने भी उर्दू को मुसलमानों की दूसरी भाषा ही कहा था.


मुस्लिम काल में उर्दू सरकारी काम-काज की भाषा थी इसलिए सरकारी काम-काज से प्रमुखतः जुड़े कायस्थों, ब्राम्हणों और क्षत्रियों को इसका प्रयोग करने के लिये बाध्य होना पड़ा. जो गरीब हिन्दू बलात मुसलमान बनाये गए वे किसान-सिपाही थे जिन्हें भाषिक विकास से कोई सीधा सरोकार नहीं था. उर्दू के विकास में सर्वाधिक प्रभावी भूमिका दिमाग से तेज और सरकारी बन्दोबस्त से जुड़े कायस्थों ने निभाई जिसका लाभ उन्हें राजस्व से जुड़े महकमों में मिला. उर्दू संस्कृत, प्राकृत, अरबी, फ़ारसी तथा स्थानीय बोलिओं के शब्दों का सम्मिश्रण अर्थात चूँ-चूँ का मुरब्बा हो गई.


उर्दू का छंद शास्त्र यद्यपि अरबी-फारसी से उधार लिया गया किन्तु मूलतः वहाँ भी यह संस्कृत से ही गया था, इसलिए उर्दू के रुक्न और बहरें संस्कृत छंदों पर ही आधारित मिलती हैं. फारस और अरब की भौगोलिक परिस्थितियों और निवासियों को कुछ शब्दों के उच्चारण में अनुभूत कठिनाई के कारण वही प्रभाव उर्दू में आया. कवियों ने बहरों में कई जगहों पर भारतीय भाषाओँ के शब्दों के प्रयोग में बाहर के अनुकूल नहीं पाया. फल यह हुआ कि शब्दों को तोड़-मरोड़कर या उसका कोई अक्षर अनदेखा -अन उच्चारित कर (हर्फ़ गिराकर) उपयोग करना और उसे सही साबित करने के लिये उसके अनुसार नियम बनाये गये. और के स्थान पर औ', मंदिर के स्थान पर मंदर, जान के स्थान पर जां, माकन के स्थान पर मकां आदि ऐसे ही प्रयोग हैं. इनसे कई जगह अर्थ के अनर्थ हो गये. मंदिर को मंदर करने पर उसका अर्थ देवालय से बदल कर गुफा हो गया.


स्वतंत्रता के बाद अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिये उर्दू प्रेमियों ने उर्दू को हिन्दी से अधिक प्राचीन और बेहतर बताने की जी तोड़ कोशिश की किन्तु आम भारतवासियों को अरबी-फ़ारसी शब्दों से बोझिल भाषा स्वीकार न हुई. फलतः, उर्दू के श्रेष्ठ कहे जा रहे शायरों का वह कलाम जिसे उन्होंने श्रेष्ठ माना जनता के दिल में घर नहीं कर सका और जिसे उन्होंने चलते-फिरते लिखा गया या सतही माना था वह लोकप्रिय हुआ. मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी जिन पद्य रचनाओं को पूरी विद्वता से लिखा वे आज किसे याद हैं जबकि जिस गजल को 'तंग रास्ता' और 'कोल्हू का बैल' कहा गया था उसने उन्हें अमर कर दिया. ऐसा ही अन्यों के साथ हुआ. दाल न गलती देख मजबूरी में उर्दू लिपि के स्थान पर देवनागरी को अपनाकर हिन्दी के बाज़ार से लाभ कमाने की कोशिश की गयी जो सफल भी हुई.


उदार हिन्दीभाषियों ने उर्दू को गले लगाने में कोई कसर न छोड़ी किन्तु उर्दू दां हिन्दी के व्याकरण-पिंगल को नकारने के दुष्प्रयास में जुट गये. हिन्दी गजलों को खारिज करने का कोई अधिकार न होने पर भी उर्दूदां ऐसा करते रहे जबकि उर्दू में समालोचना शास्त्र का हिन्दी की तुलना में बहुत कम विकास हो सका. उर्दू गजल को इश्क-मुश्क की कैद से आज़ाद कर आम अवाम के दुःख-दर्द से जोड़ने का काम हिन्दी ने ही किया. उर्दू को आक्रान्ता मुसलमानों की भाषा से जन सामान्य की भाषा का रूप तभी मिला जब वह हिन्दी से गले मिली किन्तु हिन्दी की पीठ में छुरा भोंकने से उर्दूदां बाज़ न आये. वे हिन्दी के सर्वमान्य दुष्यंत कुमार की सर्वाधिक लोकप्रिय ग़ज़लों को भी खारिज करार देते रहे. आज भी हिन्दी कवि सम्मेलनों में उर्दू की रचनाओं को पूरी तरह न समझने के बावजूद सराहा ही जाता है किन्तु उर्दू के मुशायरों में हिन्दी कवि या तो बुलाये ही नहीं जाते या उन्हें दाद न देकर अपमानित किया जाता है. इसमें कोई शक नहीं कि इस बेहूदा हरकत में उर्दू भाषा का कोई दोष नहीं है किन्तु उर्दूभाषियों को हिन्दी को अपमानित करने की मनोवृत्ति तो उजागर होती ही है.


भारत में उर्दू का सीधा विरोध न होने पर भी स्वतंत्रता के वर्षों बाद मुस्लिम आतंकवाद ने एक बार फिर उर्दू को अपना औजार बनाने की कोशिश की है. भारत सरकार ने हिंदीभाषियों के धन से उर्दू विश्वविद्यालय स्थापित करने में संकोच नहीं किया. भारत के हिन्दी विश्व विद्यालयों में उर्दू के पठन-पाठन की व्यवस्था है किन्तु हिन्दी भाषियों के करों से हिन्दी भाषी सरकार द्वारा स्थापित किये गाये उर्दू मदरसों और विश्व विद्यालयों में हिन्दी-शिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है.


बांग्ला देश ने उर्दू के घातक सामाजिक दुष्प्रभाव को पहचानकर सांस्कृतिक आधार पर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया. यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी पंजाबियों, सिंधियों बलूचोंऔर पठानों ने भी उर्दू को अपनी सभ्यता-संस्कृति के लिये घातक पाया और अब उर्दू पाकिस्तान में भी सिर्फ मुहाजिरों (भारत से भाग कर पहुँचे मुसलमान) की भाषा है. अमेरिका, जापान, रूस, या चीन कहीं भी उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है पर भारत में उर्दू पर यह ठप्पा लगाया जाता रहा है. क्या आपने किसी मौलवी, मौलाना को हिन्दी में बोलते सुना है? राम कथा और कृष्ण कथा के प्रवचनकार या हिन्दीभाषी राजनेता पूरी उदारता से संस्कृत और हिन्दी के उद्धरण होते हुई भी उर्दू के शे'र कहने में कोई संकोच नहीं करते किन्तु मजहबी या सियासी तकरीरों में आपको संस्कृत, हिन्दी ही नहीं किसी भी भारतीय भाषा के उद्धरण नहीं मिलते. अपनी इस संकीर्णता के लिये शर्मिंदा होने और सुधारने / बदलने की बजाय उर्दूदां इसे अपनी जीत और उर्दू की ताकत बताते हैं. उर्दू के पीछे छिपी इस संकीर्ण, आक्रामक और बहुत हद तक सांप्रदायिक मनोवृत्ति ने उर्दू का बहुत नुक्सान भी किया है.


भारत में जन्म लेने ओर पोसी जाने के बाद भी उर्दू अबाधी, भोजपुरी, बृज, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, मेवाड़ी, मारवाड़ी और ऐसी ही अन्य भाषाओँ की तरह आम आदमी की भाषा नहीं बन सक़ी और आज भी यह अधिकांश लोगों के लिये पराई भाषा है बावजूद इसके कि इसके कुछ शब्द प्रेस द्वारा लगातार उपयोग में लाये जाते हैं तथा इसे देवनागरी में लिखा जाता है जिससे इसके हिन्दी होने का भ्रम होता है. वस्तुतः उर्दू के पीछे सांप्रदायिक हिन्दी द्रोही मानसिकता को देखते हुए इसे हिन्दी से इतर पहचान दिया जाना बंद कर हिन्दी में ही समाहित होने दिया जाना चाहिए अन्यथा व्यावसायिक तथा तकनीकी बाध्यताओं के तहत अंग्रेजीभाषी बनती जा रही नई पीढ़ी इससे पूरी तरह दूर हो जाएगी. आज मैं अपने पूर्वजों के पुराने कागज़ नहीं पढ़ पाता चुकी वे उर्दू लिपि में लिखे गये हैं. उर्दू जाननेवालों से पढवाए तो उनमें इस्तेमाल किये गये शब्द ही समझ में नहीं आये.


तकनीकी कामों में रोजगार पाये नवयुवक गैर अंग्रेजी बहुत कम और सिर्फ मनोरंजन के लिये पढ़ते हैं... उनके बच्चों और परिवारजनों की भी यही स्थिति है. दिन-ब-दिन इनकी तादाद बढ़ती जा रही है. इन्हें भारतीयता से जोड़े रखने में सिर्फ हिन्दी ही समर्थ है. इस वर्ग में विविध प्रान्तों के रहवासियों जिनकी मूल भाषाएँ अलग-अलग हैं विवाह कर रहे हैं... इनकी भाषा क्यों हो? एक प्रान्त की भाषा दूसरे को नहीं आती... विकल्प मात्र यह कि वे अंग्रेजी बोलें या हिन्दी. वे बच्चों को भारतीयत से जोड़े रखना चाहते हैं. भोजपुरी पति की तमिल पत्नि भोजपुरी बोल सकेगी क्या? बंगाली पति अपनी अवधी पत्नि की भाषा समझ सकेगा क्या? पश्तो, डोगरी, मेवाड़ी, मारवाड़ी, बुन्देली, मैथिली, अंगिका, बज्जिका, मालवी, निमाड़ी, हल्बी, गोंडी, कैथी, कोरकू, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ आदि हर भाषा पूज्य है किन्तु अपने मूल रूप में सभी उसे अपना नहीं सकते. एक सीमा तक अंग्रेजी या हिन्दी ने अन्य भाषाओँ से अधिक अपनी पहुँच बनाई है. अंग्रेजी के विदेशी मूल तथा भारतीय सामान्य जनों से दूरी के कारण हिन्दी एकमात्र भाषा है जो आम भारतीयों, अनिवासी भारतीयों, आप्रवासी भारतीयों तथा विदेशियों को एक सूत्र में जोड़कर संवाद का माध्यम बन सकती है.


हमें सत्य से साक्षात करन ही होगा अन्यथा हम अपने ही वंशजों से दूर हो जायेंगे या वे ही हमें समझ नहीं सकेंगे. उर्दूभाषियों तथा उर्दूप्रेमियों को भी इस परिदृश्य में अपनी संकीर्ण भावना छोड़कर हिन्दी के साथ गंगा-यमुना की तरह मिलना होगा अन्यथा हिन्दीभाषी भले ही मौन रहें समय हिन्दी से गैरियत और दूरी रखने की मानसिकता को उसके अंजाम तक पहुँचा ही देगा.


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Comment by sanjiv verma 'salil' on November 22, 2010 at 11:46am
उर्दू मेरे पूर्वजों की जुबान रही है. मेरे खानदान के तमाम कागजात उर्दू में हैं. मुझे उर्दू भाषा से नहीं उर्दूभाषी-साम्प्रदायिकता से परहेज़ है. श्री जोगेश्वर गर्ग जी ने बिलकुल सही कहा है. उर्दूदां इस जुबान को सांप्रदायिक बना रहे हैं और हिन्दीभाषी हिन्दी, अंग्रेजी की तरह इस जुबान पर भी अत्याचार कर रहे हैं. असलियत में भाषा माँ की तरह होती है जिससे तरीके और तमीज से बात की जानी चाहिए... हम लाड़ करें और बेशऊरी करें इन दोनों में बहुत बारीक फर्क है जिसे जानते हुए भी न जानने और मानते हुए भी न मानना खुद की काहिली को छिपाने का बहाना भर है. मुझे किसी भाषा से बैर नहीं है. हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू जो भी बोलें और लिखें उसके व्याकरण और छंदशास्त्र का पालन करें किसी अन्य भाषा का शब्द प्रयोग करें तो जिस भाषा में प्रयोग करें उसके नियमों में ढालकर करें. 'लेडियों को फ्रीडमता चाहिए', 'पेट में 'हैडेक' जैसे प्रयोग हास्यास्पद हैं. कविता तो भाषा को संस्कारित करती है यदि कविता में भाषा के दोषपूर्ण रूप का व्यवहार हो तो चिंता की बात है.

प्राथमिक कक्षा में भाषा सीखने के बाद विद्यार्थी गणित, विज्ञान आदि कठिन विषयों पर अधिकतम समय, श्रम लगाता है. भाषा पर न्यूनतम ध्यान दिया जाता है जबकि वह हर विषय और विचार की अभिव्यक्ति का माध्यम है. परिणाम यह कि पढ़ाई पूर्ण करने पर सामान्य विद्यार्थी अन्य विषयों का जानकार होता है जबकि भाषा में उसकी जानकारी अत्यल्प ही होती है. भाषा के शिक्षकों की तुलना में अन्य विषयों के शिक्षक प्रायः उच्च शिक्षित और प्रवीण होते हैं. प्राथमिक कक्षा के हिन्दी शिक्षक बहुधा उच्चारण ही सही नहीं कर पाते. यह कमी बड़े होकर हम स्वयं दूर करने के स्थान पर भाषिक दोषों की वकालत करने लगते हैं. मैंने केवल १० वीं कक्षा तक हिन्दी पढ़ी, फिर अभियांत्रिकी में अंग्रेजी माध्यम लेने पड़ा किन्तु शालेय हिन्दी शिक्षकों की कुशलता और लगातार साहित्य पढने-समझने और अपनी गलतियों को सुधारने की प्रवृत्ति ने भाषा को परिमार्जित किया है.

निवेदन मात्र यह है कि भाषा को सँवारने पर ध्यान देना आवश्यक है. सशक्त और कमजोर भाषा बोलने-लिखनेवालों के पास शब्द भण्डार प्रायः एक सा होता है, अंतर शब्दों के समुचित प्रयोग में है. दो व्यक्तियों के पास एक से कपडे हों पहला ज्यों का त्यों पहन ले... दूसरा धोकर, बटन आदि लगाकर, प्रेसकर पहने तो किसे बेहतर कहेंगे?
Comment by विवेक मिश्र on November 15, 2010 at 5:26pm
आचार्य जी को सादर प्रणाम,
आपका लेख पढ़ा. उर्दू भाषा के इतिहास तथा जुड़े कुछ नए तथ्यों को जानने का अवसर मिला. ऐसी एतिहासिक जानकारी साझा करने के लिए हार्दिक धन्यवाद.
परन्तु आपके लेख की कुछ पंक्तियाँ अब अभी गले में अटकी हुई हैं.

१) "उर्दू का सौन्दर्य विष कन्या के रूप की तरह मादक किन्तु घातक है."-
मेरे विचार से संसार की हर भाषा का, अपना एक अलग ही सौंदर्य होता है. भाषा एक बहती नदी की भाँति है, जिसमे व्यक्ति अपनी भावनाओं अथवा अपने विचारों को, शब्दों की नाव में समेटकर विचरता रहता है. ऐसे में किसी भाषा-विशेष का पक्ष लेकर, इसे 'विष कन्या' कहकर संबोधित करना सही नहीं है.

२) "उर्दू अपने उद्भव से आज तक मुस्लिम आक्रमणकारियों और मुस्लिम आक्रामक प्रवृत्ति की भाषा है"-
मेरे विचार से, कोई भी भाषा, किसी व्यक्ति या समुदाय विशेष को इंगित नहीं करती. यदि देखा जाए तो आज अधिकाँश जनता किसी एक विशेष भाषा का प्रयोग न करके, कई भाषाओं और बोलियों को मिलाकर प्रयुक्त करती है. हम सभी (मैं स्वयं भी), दिन भर में अनेकों बार कभी हिंदी, कभी भोजपुरी, उर्दू, पूंजाबी और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करते हैं और गौरतलब ये है कि बोलते समय हम भाषा को ध्यान में रखकर नहीं बोलते.

एक छोटी सी घटना ध्यान आती है. तब मैंने 'सरस्वती शिशु मंदिर' की नवम कक्षा में तुरंत ही प्रवेश लिया था. वंदना-काल के बाद, हमारे प्रधानाध्यापक महोदय ने हम सभी को संबोधित करते हुए कहा- "आप सभी, अपनी-अपनी "द्विचक्रचालिकाओं" को उनके नियत स्थान पर ही रखेंगे. जो कोई छात्र, इस नियम का उल्लंघन करता हुआ प्राप्त होगा, उसे दण्डित किया जाएगा." चूंकि मैं नया था, इसलिए उनकी बात मेरे सर के ऊपर से निकल गयी. बाद में अपने कई सहपाठियों से इसका मतलब जानने की कोशिश की, पर किसी को भी इसका अर्थ मालूम नहीं था. बाद में हमारे कक्षचार्य (क्लास-टीचर) ने बताया कि सभी को अपनी -२ साइकिलें निर्धारित 'साइकिल-स्टैंड' पर ही खड़ी करनी है और यह बात स्पष्ट करते हुए वे स्वयं भी हँसे बिना न रह सके. आज भी उस दिन को याद करके, होठों पर मुस्कान आ जाती है.

अर्थात, भाषा वह हो जो जनमानस में सर्वसुलभ हो और सबके ह्रदय तक पहुंचे. भारत जैसे देश में, जहां लगभग हर २० कोस के बाद बोली बदल जाती है तथा हर भाषा के जानकार लोग रहते है, किसी भी एक भाषा को तवज्जो देना और दूसरी को "चूँ-चूँ का मुरब्बा" कहना तर्क संगत नहीं और न ही न्यायोचित है.
ऐसे में 'नवीन जी' की बात बहुत सही लगी- "उन्मुक्त गगन में विचरते पक्षी की तरह होती है भाषा" तथा "इतिहास में तो हर तरह की चर्चाएँ मिल ही जाती हैं, और साथ में उन का मूल्यांकन भी"

आपका शिष्य-
विवेक मिश्र 'ताहिर'
Comment by jogeshwar garg on November 15, 2010 at 1:02pm
अतिसुन्दर लेख !
एक और बात. उर्दू-दां लोगों को जब किसी अभिव्यक्ति के लिए अरबी फारसी के अलावा कोई शब्द चाहिए होता है तब वे इंग्लिश को प्राथमिकता देते हैं न कि हिंदी को. उदाहरण के लिए "प्रोग्राम" चलेगा "कार्यक्रम" नहीं. यह भी उनकी हिंदी विरोधी मानसिकता का प्रतीक है.

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