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ये कहाँ खो गई इशरतों की ज़मीं;
मेरी मासूम सी ख़ाहिशों की ज़मीं; (१)

फिर कहानी सुनाओ वही मुझको माँ,
चाँद की रौशनी, बादलों की ज़मीं; (२)

वक़्त की मार ने सब भुला ही दिया,
आसमां ख़ाब का, हसरतों की ज़मीं; (३)

जुगनुओं-तितलियों को मैं ढूंढूं कहाँ,
शह्र ही खा गए जंगलों की ज़मीं; (४)

दौड़ती-भागती ज़िंदगी में कभी,
है मुयस्सर कहाँ, फ़ुर्सतों की ज़मीं; (५)

गेंहू-चावल उगाती थी पहले कभी,
बन गई आज ये असलहों की ज़मीं; (६)

क्या बताऊँ मैं 'वाहिद' तमन्ना कोई,
अब तलक दूर है मन्नतों की ज़मीं; (७)

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Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on October 2, 2012 at 8:47pm

प्रशंसा हेतु धन्यवाद राजीव जी !

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on October 2, 2012 at 8:47pm

आदरणीया सीमा जी,

बहुत देर से लौटा हूँ करबद्ध हूँ! आप जैसी विदुषी से प्रशंसा के कुछ बोल पुरस्कार के समान हैं! आपके दो शे'र निस्संदेह मेरे कथ्य को अत्यंत उत्कृष्ट ढंग से संप्रेषित कर रहे हैं! विनयावनत,

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on October 2, 2012 at 8:43pm

महिमा जी हार्दिक धन्यवाद आपका! विलंबित उत्तर हेतु क्षमाप्रार्थी हूँ!

Comment by Rajeev Mishra on September 20, 2012 at 10:48pm

निशब्द !

Comment by seema agrawal on September 11, 2012 at 3:10pm

बहुत मुश्किल में  पड़ गयी मै तो देर से पहुँच कर कि अब क्या बोलूँ इतनी तारीफ़ तो पहले ही हो चुकी है किसी भी शेर को पढ़ो लगता है यही बेस्ट है ...मतलब पहले शेर से लेकर अंतिम शेर तक सभी बेस्ट 

ये कहाँ खो गई इशरतों की ज़मीं; 
मेरी मासूम सी ख़ाहिशों की ज़मीं; .....बहुत मासूम सी बात 

जुगनुओं-तितलियों को मैं ढूंढूं कहाँ, 
शह्र ही खा गए जंगलों की ज़मीं; ..............वाह बहुत खूब संदीप जी

....................................................सडकें बनती रहीं गाँव खोते रहे 

....................................................यूँ तरक्की के हम बीज बोते रहे 

दौड़ती-भागती ज़िंदगी में कभी, .............अर्श पा तो लिए कामयाबी के ,पर 

है मुयस्सर कहाँ, फ़ुर्सतों की ज़मीं;..........चैन के फर्श आंसू से धोते रहे 

चलिए आपके बहाने मैने  भी दो शेर कह लिए 

दिली मुबारकबाद इस खूबसूरत गज़ल के लिए 

Comment by MAHIMA SHREE on September 11, 2012 at 1:14pm

जुगनुओं-तितलियों को मैं ढूंढूं कहाँ, 
शह्र ही खा गए जंगलों की ज़मीं; (४) 

दौड़ती-भागती ज़िंदगी में कभी, 
है मुयस्सर कहाँ, फ़ुर्सतों की ज़मीं; (५) 

गेंहू-चावल उगाती थी पहले कभी, 
बन गई आज ये असलहों की ज़मीं; (६)

 वाह !!! क्या बात है आदरणीय वाहिद साहब .. बहुत ही बढियां ...बधाई आपको .. 

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on September 8, 2012 at 11:03am

आदरणीया सरिता जी,

एक लंबे अंतराल के पश्चात आपकी प्रोत्साहनयुक्त प्रतिक्रिया पा कर हार्दिक प्रसन्नता हो रही है! साभार,

Comment by Sarita Sinha on September 7, 2012 at 7:52pm

आसमां की तलाश में जाने कब,

हो गयी गुम पैरों तले की ज़मीं ............
खूबसूरत भावाभिव्यक्ति...
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on September 4, 2012 at 12:59pm

आदरणीय अशोक जी,

आपकी सराहना और प्रशंसा के लिए हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ!

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on September 4, 2012 at 12:58pm

अब क्या कहूँ संदीप जी आपने तो निरुत्तर कर दिया! आभार,

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