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मेरी सोच

तत्पर सी
जिज्ञासा शून्य
सब कुछ जानती हो जैसे
क्या होगा क्या नहीं ???
शब्दों में बिलबिलाती
भावों में छट-पटाती सी
स्वरों में मचलती सी
तोड़ने को चक्रव्यूह
बिलकुल अभिमन्यु की तरह

भेद जाती है चक्रव्यूह
पहुँच जाती है भीतर
पर लौटते वक़्त
तोड़ देती है दम
कौरवी छल से हुए आक्रमण
और दमन चक्र से
बच नहीं पाती है
"मेरी सोच"

संदीप पटेल "दीप"

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2012 at 6:55pm
अपनी सोच को देखना, उसको समझना, उसकी निर्माण प्रक्रिया का बारीकी से अवलोकन करना... ही उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है,
वहीं कौरवी छल से उसका छिन्न भिन्न हो जाना, आत्मविश्वास हीनता को लाता है...
अपनी सोच के गहन पहलुओं को प्रस्तुत करती इस रचना हेतु बधाई आ. संदीप जी

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 1, 2012 at 3:52pm

इसी सोच को तो बचाना है, एक यही तो अपना है बाकी कुछ भी नहीं | सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई |

कृपया ध्यान दे...

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