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ताज महल 

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चंचल हिरनी मृग नयनी 

मदमस्त अदा गृह सजनी
करती श्रृंगार सौ बीमार 
उसका मेरा असीम प्यार
नयनों में अनजानी  आस 
जाने क्यों रहती अब  उदास
पूछो लाख खामोश रहती है
दिल ही दिल में क्या कहती है 
जानता हूँ  उदासी का सबब 
बंधन प्रेम न कोई मजहब 
रानी दिल की दिल राज महल 
चाहत उसकी न हो ताज महल
जीवन आना जाना व्यवहार है  
सर पर एक छत की दरकार है 
सुन्दर सा घर छोटा सा आँगन 
गूंजे  किलकारियां भीगा दामन 
चाहत मेरी ताज महल बनवाऊं 
अपनी मुमताज के सपने सजाऊँ 
कमर तोड़ महंगाई  का आलम 
जानो सब  फिर चुप क्यों जानम 
सूझत  न  उपाय किस दर जाऊं 
शाहजहाँ जैसा जिगरा  कहाँ से लाऊं 
शायद कोई शाहजहाँ फिर आएगा 
अपनी मुमताज के लिए 
ताज महल बनवायेगा 
 

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Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 21, 2012 at 4:47pm

धन्यवाद . आदरणीय भ्रमर जी, सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 21, 2012 at 4:47pm

धन्यवाद आदरणीया रेखा जी, सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 21, 2012 at 4:46pm

आदरणीय अम्बरीश जी, सादर. 

मेहनत सफल लग रही है. आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 21, 2012 at 4:44pm

स्नेही संदीप द्वेदी जी, सादर 

प्रोत्साहित हुआ. आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 21, 2012 at 4:43pm

धन्यवाद, आदरणीय अलबेला जी, सादर आपकी चाहत का. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 21, 2012 at 4:42pm

धन्यवाद  आदरणीय संदीप जी, प्रोत्साहन हेतु , सादर 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 7, 2012 at 2:40pm

सुन्दर सा घर छोटा सा आँगन 

गूंजे  किलकारियां भीगा दामन 
चाहत मेरी ताज महल बनवाऊं 
अपनी मुमताज के सपने सजाऊँ 
आदरणीय कुशवाहा जी सुन्दर रचना ...दुआ है ये सारे सपने आप के सच हों मन मगन हो ताजमहल यादें दिलाता खड़ा रहे मंहगाई अन्ना जी ले जाएँ 

भ्रमर ५ 
Comment by Rekha Joshi on July 14, 2012 at 7:22pm
सूझत  न  उपाय किस दर जाऊं 
शाहजहाँ जैसा जिगरा  कहाँ से लाऊं 
शायद कोई शाहजहाँ फिर आएगा 
अपनी मुमताज के लिए 
ताज महल बनवायेगा 
Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 14, 2012 at 6:41pm

आदरणीय कुशवाहा जी......सुंदर भावनाओं से ओतप्रोत आपके इन अभिनव विचारों को नमन .....वस्तुतः ताज महल बनाना तो शाहजहाँ के बस में भी नहीं था .......उसके लिए तो साक्षात् शिवजी की कृपा ही चाहिए .....सादर ...

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 14, 2012 at 6:19pm

आदरणीय प्रदीप जी,

ताजमहल भले न बने मगर भावनाएँ सब कुछ स्पष्ट कर देती हैं| आपको लख-लख बधाईयां इस सुन्दर सृजन हेतु|

कृपया ध्यान दे...

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