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दिख रही वो ज़िन्दगानी और है;

मुझ पे जो बीती कहानी और है;

ख़ाक कर डाला मगर हम पर अभी,

इक क़यामत उसको ढानी और है;

कम न थीं पहले ही तेरी हरकतें,

और अब ये बदज़ुबानी और है;

दांव सारे आज़मा हम हैं चुके,

आख़िरी बाज़ी लगानी और है;

कश्तियाँ मझधार से लड़ आईं पर,

इक लहर आती तूफ़ानी और है;

भर गया जी इस जहाँ से अब मुझे,

इक नई दुनिया बनानी और है;

वो जवां थे मर मिटे इस मुल्क पर,

आज की ये नौजवानी और है;

ये सियासत का है मरकज़ आज भी,

देश की पर राजधानी और है;

मशवरे देता रहे 'वाहिद तमाम,

अपने जी में हमने ठानी और है;

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Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 14, 2012 at 11:17am

मित्र वीनस जी,

मैं अगर इस तरह से ग़ज़ल कहने में कुछ हद तक सफल हो पाया हूँ तो इसमें आपका ही योगदान सर्वाधिक है| आपके सुझावों पर अमल करने के प्रयास में लगा हुआ हूँ शीघ्र ही प्रभाव दिखने लगेगा| :-))

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 14, 2012 at 11:12am

आपका हार्दिक धन्यवाद डॉ. साहिब.. 'तूफ़ानी' में 'तू' को गिरा कर 'तु' पढ़ा है.. मेरे ख़याल से ये कहन में निकल चलेगा.. 'लेकिन' और 'पर' के बीच के अंतर पर अवश्य विचार करूँगा हालाँकि यह भी मुझे 'चलेबल' लग रहा है :-))| सराहना के लिए पुनश्चः धन्यवाद..

Comment by वीनस केसरी on July 14, 2012 at 2:22am

वाह वा संदीप जी

क्या कहने एक से बढ़ कर एक शेर के लिए बधाई स्वीकारें

इस ग़ज़ल पर पहले भी काफी बात हो चुकी है आज पुनः देखा तो सोचा कमेन्ट भी कर ही दिया जाए, ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आवे ...... हा हा हा

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on July 14, 2012 at 1:22am

वाहिद भाई खूबसूरत ग़ज़ल के लिए आपको बहुत सारी दाद देता हूँ। अच्छी ज़मीन पर अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ! तूफानी शब्द  बहर से थोड़ा खटक रहा है....और ग़ज़ल में "लेकिन" के भाव के लिए "पर" शब्द प्रयोग करना कहन तक उचित है इसे देख लीजिएगा। एक बार पुन: आपको मुबारकबाद !!

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 12, 2012 at 12:17pm

अपने ख़ास अंदाज़ में प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद दीप जी! आपकी हर दाद क़ुबूल है! :-)

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2012 at 12:10pm

वाह वाह
एक एक शेर की अपनी जुबानी है लाजवाब
शानदार ग़ज़ल और जानदार ग़ज़ल कही है संदीप भाई जी
इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद क़ुबूल कीजिये

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 12, 2012 at 10:43am

आदरणीया राजेश कुमारी जी,

ग़ज़ल आपको पसंद आई इसके लिए आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ|

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 12, 2012 at 10:42am

हौसलअफ़ज़ाई के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया उमाशंकर जी!!

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 12, 2012 at 10:41am

आदरणीय सौरभ भईया,

आपकी पारखी दृष्टि से मिली सराहना निश्चय ही एक सम्मान के समान है| दरअस्ल ये ग़ज़ल ग़ालिब की एक ग़ज़ल से प्रेरित है और तरही मुशायरे की तर्ज पर उनके एक मिसरे 'अपने जी में हमने ठानी और है' को लेकर लिखी गई है| :-))

सादर,

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 12, 2012 at 10:39am

सादर भ्रमर भाई.. आपका उत्साहवर्धन सदैव ही एक नवीन ऊर्जा का संचार करता है! हार्दिक आभार..!

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