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धरा लुट गयी तो गगन बेच देंगे

लुटेरे वतन के वतन बेच देंगे
धरा लुट गयी तो गगन बेच देंगे

सजावट बनावट जिसे भा रही हो
कली फूल क्या है चमन बेच देंगे

अगर आँख खोली न अपनी अभी तो
फरेबी कलामो- रमन बेच देंगे

बनाया नहीं गर नया कुंड कोई
बली दे पुजारी हवन बेच देंगे

हटा ली निगाहें अगर झूठ से अब
शहादत निगल के कफ़न बेच देंगे

न दहशत न वहशत मिटेगी कभी भी
जमीं से सियासी अमन बेच देंगे

न फानूश अब तो खुदा भी रहा है
बुझा "दीप" आमिल पवन बेच देंगे

संदीप पटेल "दीप"

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Comment

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Comment by MAHIMA SHREE on June 8, 2012 at 10:58pm

संदीप जी वाह !! बहुत खूब बधाई

Comment by Rekha Joshi on June 8, 2012 at 10:04pm

सजावट बनावट जिसे भा रही हो 
कली फूल क्या है चमन बेच देंगे ,badhiya rachna ,badhai 

Comment by आशीष यादव on June 8, 2012 at 7:36pm
वाह, जबरदस्त रचना।
Comment by Albela Khatri on June 8, 2012 at 6:08pm

waah !

behtareen gazal

badhaai ho bhai Sandeep Patel DEEP ji...........

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 8, 2012 at 3:39pm

कसावट भरी गजल भ्रष्ट व्यवस्था,भ्रष्ट आचरण पर

बहुत ही  आक्रामक प्रयोग

गजल में ऐसा प्रयोग बेहतरीन है इतनी सुन्दर रचना के लिए बधाई

Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on June 8, 2012 at 2:15pm

उम्दा गज़ल , बहर का बहुत बढ़िया प्रयोग, ज़बरदस्त गज़ल रचना के लिए आपको बधाई ...........

 

Comment by अरुण कान्त शुक्ला on June 8, 2012 at 2:05pm

एकदम सच कहा है , आपने | मेरी एक कविता है , मई में लिखी थी , पर भूलवश पहले फेसबुक पर डाल दी थी | पूर्व प्रकाशित ओबीओ में नहीं प्रकाशित होता , इसलिए ओबीओ पर नहीं डाली | उसका एक पड़ आपको नजर है ..

हर  चेहरे पर नकाब चिपका हो ,

बड़ा वही जो बिकता हो ,

कितना नाम को रोईये ,

कितना ईमान को रोईये ,

अच्छी रचना के लिए बधाई |

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 8, 2012 at 12:53pm

बहुत सुन्दर बात कही. अब बेचने पे आमादा हैं तो कुछ भी असंभव नहीं. बधाई 

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