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 मैंने अपने अंदर बना डाले हैं

अजीब से दायरे 

अनेक बंधन 

अनेक विचार 

मैंने पाल रखे हैं

अजीब सी मान्यताएं 

अनेक नियम 

अनेक प्रथाएं

इनसे निकल नहीं  पाती

घुमती रहती हूँ उसी में

बाहर जा नहीं पाती

मैंने कही भी नहीं

खुले  रखे हैं दरवाजे

डाल रखे हैं दरवाजो पे

बड़े बड़े ताले

खो बैठी हूँ उनकी चाभियाँ

नहीं ढूंढने जाती हूँ उन्हें

सोच रखे हैं कई बहाने

बाहरी हवाएं नहीं आती

मौसम भी नहीं बदलते

सूरज की किरणें  भी

लौट जाती है टकराकर

दो पल खुश हो जाती हूँ

अपने इंतजामात पर

पर अगले पल ही छा जाता है

घनघोर अँधेरा

मुश्किल होता है

ये जानना

दिन है या रात हो गयी है

सच है या

है कोई मायाजाल 

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Comment

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Comment by Ajay Singh on May 26, 2012 at 6:07pm

really nice...........

Comment by Sarita Sinha on May 8, 2012 at 7:48pm

स्नेही महिमा जी, मन की उहापोह व अंतर्द्वंद  को दर्शाती सफल रचना.....बधाई...मुझे आने में देर हो गयी..sorry

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 7, 2012 at 1:52pm

मैंने कही भी नहीं
खुले रखे हैं दरवाजे
डाल रखे हैं दरवाजो पे
बड़े बड़े ताले
खो बठी हूँ उनकी चाभियाँ
नहीं ढूंढने जाती हूँ उन्हें
सोच रखे हैं कई बहाने
महिमा जी सुन्दर और गहन भाव लिए रचना ..काश ये ताले टूट जाएँ अँधेरा न छाये सब कुछ सुहाना हो रौशनी बिखरे मानव खुद पर नियंत्रण रखे तो आनंद और आये
जय श्री राधे
भ्रमर ५

Comment by MAHIMA SHREE on May 7, 2012 at 12:46pm
आदरणीय सौरभ सर ,
सादर नमस्कार , आपने समय दिया , पढ़ा , आपके सकरात्मक प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ ,
बहुत-२ धन्यवाद

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 5, 2012 at 9:02pm

आत्ममुग्धता की विवेचना करती एक सशक्त रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई, महिमा जी.

Comment by MAHIMA SHREE on May 5, 2012 at 2:48pm
वाहिद जी नमस्कार ,
आपके बहुमूल्य प्रतिक्रया के लिए तहे दिल से आभारी हूँ . बहुत -२ धन्यवाद आपका
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on May 5, 2012 at 12:37pm

आपका मायाजाल है तो यथार्थपरक क्यूंकि हम सभी अपने अंदर कुछ ऐसे नियम बना लिए हैं ऐसी धारणाएं पाल ली हैं कि उन्हीं में बंधे रह जाते हैं| फिर भी इसमें रहस्यवाद की पूरी झलक मिल रही है| उत्कृष्ट काव्य की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें महिमा जी!

Comment by MAHIMA SHREE on May 5, 2012 at 12:22pm
आदरणीय अविनाश जी , कविता को पसंद करने के लिए आभारी हूँ
बहुत-२ धन्यवाद आपका /
Comment by AVINASH S BAGDE on May 4, 2012 at 10:35am

मैंने कही भी नहीं

खुले  रखे हैं दरवाजे

डाल रखे हैं दरवाजो पे

बड़े बड़े ताले

खो बैठी हूँ उनकी चाभियाँ

नहीं ढूंढने जाती हूँ उन्हें


sach me..

सच है या

है कोई मायाजाल  ...wah! Maheema ji.

Comment by MAHIMA SHREE on May 3, 2012 at 3:07pm
आदरणीय लक्ष्मण सर , नमस्कार
सहमत हूँ आपसे अगर हम अपने संकुचित दायरे से बाहर निकल आने में सफल हो जाए तो देव तुल्य हो जायेगे .
आपका हार्दिक धन्यवाद .. स्नेह बनाये रखे

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