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मैंने जीना चाहा था

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था,
चाक कलेजे के ज़ख्मों को मैंने सीना चाहा था;
जो भी आया उसने ही कुछ दुखते छाले फोड़ दिए,
वहशत की आग बुझाने को मेरे सब सपने तोड़ दिए;
तेरे आँचल के धागों से रिसना ढकना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयाँ करेगी- मैंने जीना चाहा था |

अपनी ही रुसवाई पर, हम तो हँसते रहे सदा,
गम को गले लगा के रोये, खुशियाँ करते रहे विदा;
गम बाजारू हों ना जाएँ, आँसू पीना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

तुझको देखा, तुझको चाहा, मैंने तुझको जाना था,
दो पल जी लूँ तेरा बनकर, और तो ना कुछ पाना था;
कुछ सूखे ज़ख्मों का मैंने दर्द भुलाना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

तेरे होठों की जुम्बिश को मैंने माथे पर रखा,
तेरी कही-अनकही बातों को पल-पल पहचाना था;
मैं ना तुझसे दगा करूँगा, यकीं दिलाना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

बस तेरे इक पल की खातिर मैंने दर्द हज़ार जिए,
प्यास बुझाने की खातिर अपने आँसू दिन रात पिए;
ना कोई दरकार और थी, ना कुछ लेना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयान करेगी – मैंने जीना चाहा था |

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Comment

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Comment by Chaatak on March 20, 2012 at 10:17pm

स्नेही श्री कुशवाहा जी, सादर अभिवादन, आपका प्रेम, प्रोत्साहन और अपनापन पाकर हृदय प्रफुल्लित हो उठा|
हार्दिक धन्यवाद !

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 20, 2012 at 9:58am

चाक कलेजे के ज़ख्मों को मैंने सीना चाहा था;
जो भी आया उसने ही कुछ दुखते छाले फोड़ दिए,

snehi chaatak ji. sadar abhivadan. jo pida aapko logon se hai vahi aaj mujhe ho gayi. kafi dinon se aapki post ki pratiksha thi. aaj ye post mili to vahi pida mujhe bhi ho gayi. mesage kar diya hota. main bhi anand leta. apna hi samjhen mujhe. yogya nahi hoon to kya hua saath to hun.  rachna , bhav, prastutikaran sundar. aur mera aap ko bahut bahut pyar. badhai. 

Comment by Chaatak on March 14, 2012 at 10:46pm

स्नेही अग्रज, सादर अभिवादन, पंक्तियों पर आपकी अनमोल प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Comment by Chaatak on March 14, 2012 at 10:45pm

स्नेही सौरभ जी, सादर अभिवादन, उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद!

Comment by Chaatak on March 14, 2012 at 10:44pm

महिमा जी, पंक्तियों पर आपकी राय जानकर् अतीव प्रसन्नता का अनुभव हुआ|
बहुत बहुत शुक्रिया !

Comment by Chaatak on March 14, 2012 at 10:43pm

स्नेही योगराज जी, सादर अभिवादन, पंक्तिया आपको पसंद आईं ये जानकर् बहुत खुशी हुई|
प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Comment by Chaatak on March 14, 2012 at 10:41pm

दिव्या जी, प्रोत्साहन का तहे-दिल से शुक्रिया !

Comment by अश्विनी कुमार on March 13, 2012 at 9:55pm

व्यथित आत्म की चेतनता फिर सजीव बन आई ,

यह सुर्ख इबारत बयां है करती जीवन की गहराई ,,.......................................प्रिय अनुज :)  जय भारत 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 13, 2012 at 5:13pm

सूर्ख़ इबारत ! वाह !! बहुत कुछ कह गयी !  बहुत कुछ सुन लिया. अच्छी गेय रचना. 

तेरे होठों की जुम्बिश को मैंने माथे पर रखा   के लिये हृदय से बधाई स्वीकार करें.  

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 5:01pm
तुझको देखा, तुझको चाहा, मैंने तुझको जाना था,
दो पल जी लूँ तेरा बनकर, और तो ना कुछ पाना था;


चातक जी , नमस्कार
अपने नाम को सार्थक करती हुई रचना......ह्रदय के पीड़ा की बेलाग अभिव्यक्ति.....
बहुत -2 बधाई...

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