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ये आज का युवा हैं

आंधी हैं हवा हैं

बंधनों में क्या हैं

ये उफनता दरिया हैं  

किनारे तोड़ निकला हैं

मस्ती में मस्तमौला हैं

मुश्किल में हौसला हैं

अपनी पे आजाए तो जलजला हैं

ये आज का युवा हैं

 

कभी बेफिक्री का धुआँ हैं

कभी पानी का बुलबुला हैं

कभी संजीदगी से भरा हैं

ये आज का युवा हैं

पंखों को फडफडाता हैं

पेडों पे घोंसला बनाता है

अब की उड़ना ये चाहता हैं

दाव पे ज़िंदगी लगता हैं

हारा भी हैं

तो इसे जीतना भी आता हैं

जर्रे से अस्मा हो जाता हैं

ये आज का युवा हैं

 

कभी इश्क बोतलों में नशा हैं

कभी मै दिलजलो की दवा हैं

कभी प्यार अस्मा से बरसा हैं

जैसे खुदा की दुआ हैं

ये आज का युवा हैं

 

: शाशिप्रकाश सैनी 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2012 at 7:23pm

हार्दिक आभार शशिजी.

 

Comment by shashiprakash saini on February 6, 2012 at 7:03pm
जी सौरभ जी आपकी बात का ध्यान रखूँगा
Comment by shashiprakash saini on February 6, 2012 at 6:56pm
धन्यवाद अविनाश जी
Comment by AVINASH S BAGDE on February 6, 2012 at 11:10am

कभी बेफिक्री का धुआँ हैं

कभी पानी का बुलबुला हैं

कभी संजीदगी से भरा हैं

ये आज का युवा हैं....achchhe se paribhashit karti hui ' aaz k yuwa ' ko.Saini sahab.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2012 at 4:31am

रचना के लिये बधाई. 

एक सामान्य अनुरोध, रचना को पोस्ट करने के पहले थोड़ा और माँज लिया जाय तो पढ़ने वालों को साथ लिये बहा जा सकता है.

 

Comment by shashiprakash saini on February 5, 2012 at 7:22pm

सराहना हेतु आभार  आशुतोष जी 

Comment by shashiprakash saini on February 5, 2012 at 7:21pm

सराहना हेतु आभार राज जी 

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on February 5, 2012 at 1:32pm

शशि भाई साहब कमाल कॆ भाव ,,,,,,,,,,,,,बधाई,,,,,,,,,,,,,,,,,

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