For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

 

रमिया बड़ी खुश थी । शहर जो जा रही थी - अपने पोते को देखने जाने का आखिर उसे मौका मिल ही गया था । यह अवसर बनने में समय लग गया और देखते देखते उसका पोता सात साल का हो गया था । महानगर की भागम-भाग भरी जिन्दगी में से न तो उसका बेटा ही समय निकाल पा रहा था और ना ही रमिया गाँव की अपनी खेती गृहस्थी में से समय निकाल पा रही थी । या यूँ कहें कि कुछ अधिक ही व्यस्त थे दोनों ही माँ-बेटे । और रमिया का पोता सात साल का हो चला ।

महानगर के एक कोने में रह रहे अपने बेटे के घर का पता बहुत मुश्किल से ढूँढ़ पाई थी । बेटे के घर के दरवाज़े के बाहर तक पहुँच कर उसे लगा जैसे बहुत बड़ा मैदान मार लिया हो । उसकी  ख़ुशी का पारावार नहीं था । आगे बढ़कर दरवाजा पर लगी काल-बेल को दबा दिया । सात-आठ साल के बच्चे ने दरवाजा खोला । रमिया को देख कर उसके चेहरे पर अपरिचय के भाव थे । रमिया ने उसे बताया कि वह उसकी दादी है । लेकिन बच्चा निर्विकार चेहरा लेकर घर के अन्दर चला गया और रमिया के कान में उसके कहे वाक्य गूँजते रह गए - "माँ बाहर एक बुढ़िया आई है और कह रही है कि वो मेरी दादी है ......................।‌"

Views: 609

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by सुनीता शानू on September 17, 2011 at 12:20pm

ओह्ह आज जिस तरह से माँ-बाप को फ़ुर्सत ही नही की बच्चों को रिश्तों की परिभाषा समझायें। ऎसा तो होना ही था। 

एक सार्थक लघु कथा के लिये आपको बधाई नीलम जी।

सादर...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 16, 2011 at 1:35am

इस लघुकथा के लिये धन्यवाद.

Comment by Neelam Upadhyaya on September 15, 2011 at 10:32am

Dhanyawaad Brij Bhushan ji.

Comment by Brij bhushan choubey on September 14, 2011 at 12:19pm

अच्छी रचना.... ...हालाँकि इसमें नई पीढ़ी को दोष देना .उचित न होगा ..कोई किसी के प्यार दुलार को भूलाना या भूलना  नहीं चाहता |

Comment by Neelam Upadhyaya on September 14, 2011 at 10:10am

Dhanyawaad Dushyant ji.

Comment by दुष्यंत सेवक on September 13, 2011 at 11:07am

बेहद मर्मस्पर्शी रचना है नीलम जी. शहरों की भागदौड़ मे पड़कर नयी पीढ़ी के बच्चे दादा दादी और गाँव के प्यार को तो लगभग भूल ही चले हैं. बहुत ही कम शब्दों मे एक बड़े कड़वे यथार्थ से परिचय करने के लिए आपको हार्दिक आभार एवं बधाई

Comment by Neelam Upadhyaya on September 13, 2011 at 10:38am

जी गणेश जी और अरुण जी, धन्यवाद । बिल्कुल ठीक कह रहे हैं । गाँवों का जिस तेजी से शहरीकरण होता जा रहा है, लोगों में रिश्ते-नातों का महत्व कम होता जा रहा है । और संस्कार की क्या बात करें - पाश्चात्य संस्कृति किस कदर समाज पर हावी होती जा रही है यह तो हमसे छुपी बात नहीं रह गई है । इसके अंधानुकरण में हम अपनी संस्कृति भूलते जा रहें हैं साथ ही स्वार्थी भी होते जा रहे हैं । पहले जहाँ परिवार में दूसरे सदस्य के बारे में सोचते थे अब परिवार में अपने बारे में सोचते हैं । ऐसे में नाते-रिश्ते निभाने की ना तो फुरसत है और ना ही फिक्र ।

Comment by satish mapatpuri on September 12, 2011 at 8:21pm

उत्कृष्ट ................ अभिनव ............. साधुवाद स्वीकार करें

Comment by Abhinav Arun on September 12, 2011 at 7:30pm

सही शहरी विकास और संस्कृति के यथार्थ को दर्शाती रचना ... सच है हम अपने बच्चों को क्या माहौल और संस्कार दे रहे हैं ??? ये बड़ा प्रश्न है | सशक्त रचना बधाई !!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 12, 2011 at 10:44am

खुबसूरत लघु कथा, सोचने को मजबूर करती यह रचना, कही न कही इसमें रमिया का भी दोष है .....महानगर का भागमभाग तो समझ में आ रहा है पर गाँव का भागम भाग ?

बात सही है कि जैसा संस्कार मिलेगा वैसा ही बच्चा करेगा, पर यह संस्कार भी तो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है ....

 

भाव प्रधान और अर्थ पूर्ण लघु कथा सृजन हेतु आभार नीलम दीदी |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Admin posted discussions
5 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
6 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
6 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
6 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
7 hours ago
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
16 hours ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
yesterday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
yesterday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service