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Dr. Rakesh Joshi's Blog (6)

ग़ज़ल

जब हकीक़त सामने है क्यों फ़साने पर लिखूँ

ये है बेहतर, दर्द में डूबे ज़माने पर लिखूँ



खेत पर, खलिहान पर, मैं भूख-रोटी पर लिखूँ

बंद होते जा रहे हर कारखाने पर लिखूँ



फूल, भँवरे और तितली की कहानी छोड़कर

आदमी के हर उजड़ते आशियाने पर लिखूँ



ख़त्म होते जा रहे रिश्तों के आँसू पर लिखूँ

आदमी को रौंदकर पैसे कमाने पर लिखूँ



याद तुमको क्यों करूँ मैं, और क्यों करता रहूँ

इक कहानी अब मैं तुमको भूल जाने पर लिखूँ



जिसकी सूरत रात-दिन अब है… Continue

Added by Dr. Rakesh Joshi on January 5, 2016 at 9:26pm — 12 Comments

दुष्यंत कुमार को समर्पित मेरी एक ग़ज़ल

आपकी तालीम का हर अर्थ कुछ दोहरा तो है

आकाश पर बादल नहीं पर हर तरफ कोहरा तो है

 

बादशाहों की हमेशा ज़िन्दगी महफूज़ है

लड़ने-मरने के लिए शतरंज में मोहरा तो है

 

इस महल में अब खज़ाना तो नहीं बाकी रहा

द्वार पर दरबान है, संगीन का पहरा तो है

 

शोर करना हर नदी की चाहे हो आदत सही

ये समंदर हर नदी से आज भी गहरा तो है

 

तुम क़सीदे खूब पढ़ लो पर यहाँ हर आदमी

हो न गूंगा आज लेकिन, आज भी बहरा तो…

Continue

Added by Dr. Rakesh Joshi on January 4, 2016 at 10:30pm — 15 Comments

मैं गीतों को भी अब ग़ज़ल लिख रहा हूँ (डॉ. राकेश जोशी)

मैं गीतों को भी अब ग़ज़ल लिख रहा हूँ
हरेक फूल को मैं कँवल लिख रहा हूँ

कभी आज पर ही यकीं था मुझे भी
मगर आज को अब मैं कल लिख रहा हूँ

बहुत कीमती हैं ये आँसू तुम्हारे
तभी आँसुओं को मैं जल लिख रहा हूँ

लिखा है बहुत ही कठिन ज़िंदगी ने
तभी आजकल मैं सरल लिख रहा हूँ

समय चल रहा है मैं तन्हा खड़ा हूँ
सदियाँ गँवाकर मैं पल लिख रहा हूँ

मैं बदला हूँ इतना कि अब हर जगह पर
तू भी तो थोड़ा बदल लिख रहा हूँ

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Dr. Rakesh Joshi on October 19, 2014 at 5:30pm — 6 Comments

दो ग़ज़लें (डॉ. राकेश जोशी)

दो ग़ज़लें (डॉ. राकेश जोशी)



1

सब मिला है पर यहाँ सदभाव की बातें नहीं

गाँव का मौसम है लेकिन गाँव की बातें नहीं



आ, यहाँ पर बैठकर सुस्ता लें थोड़ी देर हम

धूप की बातें करेंगे, छाँव की बातें नहीं



इससे ज़्यादा क्या लिखें, इस दौर की नाकामियां

इस अँधेरे युग में भी बदलाव की बातें नहीं



दूर से ही ठीक था फैला समुंदर देखना

अब लहर के पास आकर नाव की बातें नहीं



बाद बरसों के मिले तो दोस्त बनकर हम मिलें

दर्द की बातें तो हों, पर घाव… Continue

Added by Dr. Rakesh Joshi on October 12, 2014 at 5:27pm — 7 Comments

ग़ज़ल/ इस धरती के नाम लिखूंगा हरियाली मैं (डॉ. राकेश जोशी)

जब भी आऊंगा खाकर तुमसे गाली मैं

इस धरती के नाम लिखूंगा हरियाली मैं

 

छोटे-छोटे बच्चों की उंगली थामूंगा

आसमान तक दौड़ लगाऊंगा खाली मैं

 

हरेक महल के हर पत्थर से बात करूंगा

मज़दूरों के लिए बजाऊंगा ताली मैं

 

जिस दिन तेरे बच्चे भी पढ़ने जाएंगे

उस दिन तुझे कहूँगा 'हैप्पी दीवाली' मैं

 

खेतों में सपने फिर से उगने लगते हैं

जब भी करता हूँ बातें फसलों वाली…

Continue

Added by Dr. Rakesh Joshi on August 26, 2014 at 9:46pm — 7 Comments

चार ग़ज़लें (डॉ. राकेश जोशी)

(चार ग़ज़लें)

1

रास्तों को देखिए कुछ हो गया है आजकल

इस शहर में आदमी फिर खो गया है आजकल

 

काँपते मौसम को किसने छू लिया है प्यार से

इस हवा का मन समंदर हो गया है आजकल

 

अजनबी-सी आहटें सुनने लगे हैं लोग सब

मन में सपने आके कोई बो गया है आजकल

 

मुद्दतों तक आईने के सामने था जो खड़ा

वो आदमी अब ढूँढने खुद को गया है आजकल

 

आदमी जो था धड़कता पर्वतों के दिल में अब

झील के मन में सिमटकर सो…

Continue

Added by Dr. Rakesh Joshi on August 16, 2014 at 6:00pm — 37 Comments

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