For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

पियूष कुमार पंत's Blog (10)

मैं शहर छोड़ आया उसका...

आज मैं शहर छोड़ आया उसका,

वो शहर जो हर पल मुझे,

बस याद उसकी दिलाता था,

वो शहर की जिसमें महकती थी,

बस उसी की खुशबू,

वो शहर जहां हर ओर उसके ही नगमे गूँजा करते थे,

वो वही शहर था जहां रहते थे,

बस चाहने वाले उसके,

आज भी बस शहर ही छूटा है उसका,

पर यादें अभी भी बाकी हैं किसी कोने में,

अपने इस नए शहर में भी बस,

उसकी ही परछाइयों कोई खोजता फिरता हूँ मैं,

बेशक शहर छोड़ दिया उसका मैंने,

पर इस नए शहर में भी मैं उसको ही खोजता हूँ,

बस शहर ही…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on October 4, 2012 at 9:10pm — 4 Comments

बटवारा आसमान का......

आज डूबते हुए सूरज को एक बार फिर देखा,

लालिमा से भरा सूरज अलविदा कहता हुआ,

अब सूरज छुप जाएगा बस कुछ ही पलों में,

और आकाश में दिखने लगेगा चाँद वो सुंदर सा,



कभी कभी ये भ्रम भी होने लगता है,

की क्या चाँद और सूरज अलग अलग हैं,

या सूरज ही रूप रंग बदल लौट आता है,

और दो किरदार निभाता है अलग अलग तरह के,

जैसे फिल्मों में एक ही आदमी दो हो जाता है एक होते हुए भी,

आखिर क्यों नहीं ये दोनों एक साथ दिखते हैं,

ये सोचते सोचते ही नज़र खोजने लगी आकाश…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on October 3, 2012 at 9:30pm — 2 Comments

कौन है वो बूढ़ी .....

आज चाँद दिखा आसमान में पूरा,

और वो बुढिया भी जो कात रही है,

सूत कई वर्षों से बैठी हुई तन्हा,

मैं हैरान हूँ, और परेशान भी,

क्या चाँद पर भी लोग हम जैसे ही रहते हैं,

क्या वहाँ भी बूढ़ों को यूं ही छोड़ दिया जाता है,

अकेला और तन्हा, विज्ञान कहता है कि,

कोई बुढ़िया नहीं रहती है चाँद पर,

पर मुझको तो मेरी माँ ने तो बचपन बताया था ,

सूत कातती उस बुढ़िया के बारे में,

वो चाँद मामा है हमारा हमने ये बचपन से सुना है,

तो…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on October 2, 2012 at 9:00pm — 7 Comments

आँसू चाँद के....

कई दिन की बारिश के बाद,

आज बड़ी अच्छी सी धूप खिली थी,

नीला सा आसमान,

जो भरा था कई सफ़ेद बादलों से,

कई लोगों ने अपने कपड़े,

फैला दिये थे सुखाने को छ्तों पर,

जो कई दिन से नमी से सिले पड़े थे,

याद आ ही गई बचपन की वो बात बरबस,

की जब कहा करते थे की,

बारिश होती है जब ऊपर वाला कभी रोता है,

फिर जब धूप खिलती थी,

और आसमान भर जाता था सफ़ेद बादलों से,

तब कहा करते थे की,

ऊपर वाले ने भी सुखाने डाली…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on September 27, 2012 at 10:47pm — 4 Comments

एक सपना है जीवन .......

एक सपना था जो टूट गया फिर,

व्यर्थ का ये प्रलाप है क्यों,

ख़ाबों के टूटने पर भी कभी,

कोई जान देता है भला,…



Continue

Added by पियूष कुमार पंत on September 26, 2012 at 10:13pm — 4 Comments

कब आता है कल.....

अभी कुछ देर पहले ही वो लौटा था,

घर पर आया तो कल की फिक्र में था,

बच्चे दिन से इंतज़ार में थे उसके घर आने के,

पर वो उनसे बात भी न कर सका,

वो कल की जल्दी में था,



उसने कल की तैयारी भी कर ली थी रात ही से,

जैसे वक्त बिलकुल भी नहीं हो पास उसके,

कल उसको सुबह ज़रा जल्दी निकालना था,

किसी से मुलाक़ात थी, कारोबार के सिलसिले में,

वक्त और जगह भी मुकर्रर थे मुलाक़ात के लिए,



सुबह के लिए कुछ कपड़े भी निकले उसने,

अपने कागजों को पढ़ा और…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on September 21, 2012 at 10:00pm — 1 Comment

माँ हर रूप में माँ........

आते जाते पहाड़ी जंगलों के रास्ते,

टेढ़ी मेढ़ी सी सुनसान सड़क के किनारे,

एक झुंड बैठा था कुछ बंदरों का,

मस्त थे वो सब मस्ती में अपनी,

कूदते-फाँदते कभी इस डाली,

तो कभी उस डाली,

कभी उछलते कभी झपटते,

आपस में लड़ते-गिरते,

एक पल में वो नीचे दिखते,

अगले ही पल पेड़ पे ऊंचे,

कुछ उनमें थे नन्हें बच्चे,

जो माँ की पुंछ से खेल रहे थे,

गाड़ी का ज्यों ही शोर हुआ,

सारे लपक पड़े ऊंचे पेड़ों…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on September 18, 2012 at 9:30am — 5 Comments

मैं चाँद सा सुंदर हुआ नहीं....

मेरे कमरे की खिड़की से खुला आकाश दिखता है,

कल रात ही मैंने ये महसूस किया की,

तारों से भरे काले आकाश में,

एक चाँद हर रोज इंतज़ार मेरा करता है,



लेटे लेटे ही अपने बिस्तर पर,

मैं बातें उससे अक्सर किया करता हूँ,

वो भी रूप बादल हर रोज आता है,

अभी चंद रोज पुरानी ही है मुलाक़ात हमारी,



तब छोटा सा ही तो था, फिर बढ़ते…
Continue

Added by पियूष कुमार पंत on September 16, 2012 at 9:30am — 4 Comments

हिन्दी की दुर्दशा....

मोम सी कोमल ही थी वो माँ,

जो अब मॉम कहलाने लगी है,

अच्छा भला, चलता फिरता, हिलता डुलता,

पिता न जाने कैसे डैड हो गया है.....

ये अंग्रेजी के खेल में, ये शब्दों के मेल में,

हिन्दी से बच्चा आज कुछ दूर हो चला है,

ये व्यवसायिकता की होड है,

ये आधुनिकता की अंधी दौड़ है,

अपनी मातृभाषा से जिसने दूर किया है,

यही अनदेखी एक दिन,

बहुत हम सब को  रुलाएगी,

जब सारे रिश्ते, सारे नाते और सारे संस्कार,

ये…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on September 15, 2012 at 9:49pm — 1 Comment

चाँद का जीवन....

चाँद का जीवन भी,

कितना मोहक है,

अद्भुद कितना है,

ये चाँद का जीवन, 



जन्म से ही दिखता है,

जैसे एक चेहरा मुस्कुराता हुआ,…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on September 15, 2012 at 7:35pm — 1 Comment

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
15 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
15 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service