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Kedia Chhirag
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Gender
Male
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Bhagalpur,Bihar
Native Place
Purnea, Bihar

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At 11:16pm on April 28, 2013, coontee mukerji said…

चिराग जी , मुझे आप से मित्रता करके अपार खुशी होगी . एक सौ पचास साल पहले मेरे पूर्वज बिहार से मॉरिशस गये थे . मुझे ह्मेशा अपने पूर्वज के देश के वासियों के बारे में जानने की उत्सुक्ता बनी रहती है. जाने

अंजाने मैं अपनी जड़ों को तलाशती रहती हूँ.मैं आप को हृदय से स्वागत करती हूँ.

At 6:57pm on April 27, 2013, कल्पना रामानी said…

चिराग जी, हार्दिक स्वागत आपका....

At 2:32am on April 16, 2013, vijay nikore said…

Thank you for inviting me to be your friend.

Vijay Nikore

At 4:17pm on April 15, 2013, PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA said…

hardik swagat hae aapka 

At 9:44pm on April 13, 2013, बृजेश नीरज said…

चिराग जी आपका हार्दिक स्वागत है! आपकी पहली रचना की प्रतीक्षा है।

At 3:44pm on April 13, 2013,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 4:45pm on April 11, 2013, विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी said…
केदिया चिराग जी ओ.बी.ओ. परिवार में आपका हार्दिक स्वागत है। हमें आशा है आप अपनी संलग्नता,कर्मठता और साहित्यिक प्रयास से ओ.बी.ओ. के सीखने सिखाने की परम्परा को आगे बढ़ायेंगे।
सादर

Kedia Chhirag's Blog

ग़ज़ल- ज़िंदगी क्यूँ तेरा पता ढूँढता हूँ !!

बहर - 2122 / 1212 / 2122 

रेत पर किसके नक्शे पा ढूँढता हूँ !

ज़िंदगी क्यूँ तेरा पता ढूँढता हूँ !!

किस ख़ता की सज़ा मिली मुझको ऐसी 

माज़ी में अपने ,वो ख़ता ढूँढता हूँ !!

य़क सराबों के दश्त में खो गया मैं

अब निकलने का रास्ता ढूँढता हूँ !!



दौरे गर्दिश में संग ,गर चल सके जो

कोई ऐसा मैं हमनवा ढूँढता हूँ !!

रौशनी थी मुझे मयस्सर कब आखिर

फिर भी क्यूँ कोई रहनुमा ढूँढता हूँ !!

.

चिराग़…

Continue

Posted on June 28, 2014 at 1:00pm — 13 Comments

इस अन्धकार में कितनी सदियाँ और बिताना बाकी है ?

"चीख चीख कर पूछ रहा है ,ये उद्वेलित मन मेरा मुझसे ,

इस अन्धकार में कितनी सदियाँ और बिताना बाकी है ?

चूड़ियाँ पहने पड़ी इस सुषुप्त व्यवस्था को धिक्कारने में

अब भी यूँ ही कितनी मोमबत्तियाँ और जलाना बाकी है ?

इस कुण्ठित दानवता के कुकृत्यों से लज्जित ,

आज मानवता कितनी बेबस पानी पानी है ?

मोड़ मोड़ पर खड़े ये दुर्योधन और दु:शासन ,

दुर्गा पूजती सभ्यता की क्या यही निशानी है ?

कोरे कागज़ी कानूनों के फूल चढ़ाये ,यूँ अर्थियाँ उठाते,

कितने…

Continue

Posted on June 6, 2014 at 9:30am — 4 Comments

ज़िन्दगी ठहरी फ़क़त दो पल की

खबर क्या है किसी को कल की

ज़िन्दगी ठहरी फ़क़त दो पल की

एक से ही हैं गम हमारे

एक सी ही तो खुशियाँ

दिल से दिल के दरमयाँ

फिर क्यूँ इतनी है दूरियाँ

तमन्ना किसे है आखिर ,किसी ताजमहल की

ज़िन्दगी ठहरी फ़क़त दो पल की .............

आ चल दो पल हम

जरा दिल से रो लें

नफ़रत के हर निशाँ

आँसुओं से धो लें

ओढ़ माँ का आंचल

दो पल को हम सो लें

जिन्दगानी हो कहानी ,यक नए पहल की

ज़िन्दगी ठहरी फ़क़त दो पल की…

Continue

Posted on December 3, 2013 at 4:00pm — 9 Comments

मुझमें बसी मेरी कविता है तू

"रचा न जिस वास्ते तुझे खुदा ने

उस रंग में कभी खुद को न रंग

दुनियादारी है रवायत दुनिया की

दुनियादार न बन दुनिया के संग

निश्चल ये दिल है ,चंचल जैसे

छलछल कलकल बहता पानी है

थम न जाना किसी मराहिल पे

दरिया की तो रविश ही रवानी है

खिलखिलाते देखता हूँ तुझे जब भी

याद आता है मुझको अपना बचपन

क्या बख्त होगा उस घर आँगन का

तेरे क़दमों से जो हो जायेगा गुलशन



खुदा न बशर ,न हूर न फ़रिश्ता है तू

अन्तर्मन में…

Continue

Posted on August 1, 2013 at 8:30am — 2 Comments

 
 
 

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