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"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-129 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,

सादर नमन।
.
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
प्रस्तुत है.....
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-129
विषय : विषय मुक्त
अवधि : 30-12-2025 से 31-12-2025
.
अति आवश्यक सूचना:-
1. सदस्यगण आयोजन अवधि के दौरान अपनी केवल एक लघुकथा पोस्ट कर सकते हैं।
2. रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना/ टिप्पणियाँ केवल देवनागरी फॉण्ट में टाइप कर, लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड/नॉन इटेलिक टेक्स्ट में ही पोस्ट करें।
3. टिप्पणियाँ केवल "रनिंग टेक्स्ट" में ही लिखें, 10-15 शब्द की टिप्पणी को 3-4 पंक्तियों में विभक्त न करें। ऐसा करने से आयोजन के पन्नों की संख्या अनावश्यक रूप में बढ़ जाती है तथा "पेज जम्पिंग" की समस्या आ जाती है। 
4. एक-दो शब्द की चलताऊ टिप्पणी देने से गुरेज़ करें। ऐसी हल्की टिप्पणी मंच और रचनाकार का अपमान मानी जाती है।आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है, किन्तु बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पाए इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है। देखा गया कि कई साथी अपनी रचना पोस्ट करने के बाद गायब हो जाते हैं, या केवल अपनी रचना के आस पास ही मंडराते रहते हैंI कुछेक साथी दूसरों की रचना पर टिप्पणी करना तो दूर वे अपनी रचना पर आई टिप्पणियों तक की पावती देने तक से गुरेज़ करते हैंI ऐसा रवैया कतई ठीक नहींI यह रचनाकार के साथ-साथ टिप्पणीकर्ता का भी अपमान हैI
5. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति तथा गलत थ्रेड में पोस्ट हुई रचना/टिप्पणी को बिना कोई कारण बताये हटाया जा सकता है। यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
6. रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका, अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल/स्माइली आदि लिखने/लगाने की आवश्यकता नहीं है।
7. प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार "मौलिक व अप्रकाशित" अवश्य लिखें।
8. आयोजन से दौरान रचना में संशोधन हेतु कोई अनुरोध स्वीकार्य न होगा। रचनाओं का संकलन आने के बाद ही संशोधन हेतु अनुरोध करें। 
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मंच संचालक
योगराज प्रभाकर
(प्रधान संपादक)

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नववर्ष की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं समस्त ओबीओ परिवार को। प्रयासरत हैं लेखन और सहभागिता हेतु।

चमत्कार की आत्मकथा (लघुकथा):
एक प्रतिष्ठित बड़े विद्यालय से शन्नो ने इस्तीफा दे दिया था। कुछ महीनों बाद फ़िर मीडिया सक्रिय हो गया इस शिक्षिका के इस्तीफे के मुद्दे पर। पत्रकार उसे घेरने लगे। एक पत्रकार से आज फ़िर शन्नो रूबरू हुई। मौक़ा था उसकी पुस्तक के विमोचन का उसके ही निजी संस्थान में उसकी ही एक दिव्यांग छात्रा द्वारा। सवाल-जवाब शुरू हुए।
"क्षमा करें मैं प्रचलित शब्द का इस्तेमाल करते हुए पूछ रहा हूं कि एक किन्नर अपनी आत्मकथा लिखने को कैसे प्रेरित हुई या मज़बूर हुई?" पत्रकार ने विमोचित पुस्तक के पन्ने पलटते हुए कहा।
"पुस्तक तो छात्र जीवन से ही लिखना शुरू कर दी थी डायरी रूप में। लेकिन इस्तीफे के बाद यह मुकम्मल हुई। जहां तक प्रेरणा या मज़बूरी की बात है, तो यह हेलन केलर जी  की आत्मकथा और उनकी ज़िंदगी से प्रेरित होकर इस सदी के समाज द्वारा मज़बूर किये जाने का नतीज़ा है!" शन्नो ने अपने किन्नर जीवन के संघर्ष और अपनी आदर्श हेलन केलर का स्मरण करते हुए एक लम्बी सांस लेकर कहा।
"आप हेलन केलर से कैसे प्रभावित हुईं?" पत्रकार ने संस्थान के दिव्यांग और किन्नर विद्यार्थियों की गतिविधियों को दूर से देखते हुए पूछा।
"दसवीं कक्षा की पुस्तक से उन पर लिखे एक अध्याय से जितना मैं उनसे प्रभावित हुई, उतनी ही उनकी मॉं और शिक्षिका ऐनी सुलिवन से।" यह कहते हुए अबकी बार शन्नो की ऑंखों से अश्रु छलक पड़े, "काश, मेरी ज़िन्दगी में ऐसे मॉं-बाप और कोई शिक्षक मिला होता!"
"आप अपनी शिक्षा और इस्तीफे की वज़ह किसे मानती हैं?" अगला सवाल पूछा गया।
"सरकार और थर्ड जेंडर के लिए बनाए गए क़ानूनों और नीतियों को, उनकी जानकारी देने वाले परिचितों को और ऐनी सुलिवन को। मैं ऐनी की तरह शिक्षिका बन कर रहूंगी। जहॉं तक इस्तीफ़े की बात है, यह मेरा बहुत ही निज़ी मसला है!" रूमाल से अपने ऑंसू पोंछते हुए शन्नो बोली, "विस्तार से जानने के लिए आप मेरी यह आत्मकथा पढ़ लीजिए...और हॉं.. उसके पहले हेलन केलर की आत्मकथा भी पढ़ लीजिएगा। गनीमत है कि मेरी ज़िन्दगी की पॉजिटिविटी और उपलब्धियों की आधार और स्रोत बन गई वह... वरना...।" 
"वरना क्या? कुछ और भी कहना चाहती हैं आप! कह डालिए आज!" पत्रकार ने अपना कैमरा शन्नो के क्लोजअप पर फोकस करते हुए कहा।
"अंत में मैं संक्षेप में यही कह सकती हूं कि सरकारी क़ानूनों और सुविधाओं के बावजूद दिव्यांगों और हम किन्नरों के साथ मर्दों का बर्ताव वैसा ही है, जैसा रहा है। कहते हैं कि हर कामयाब मर्द के पीछे एक औरत होती है, लेकिन हर किन्नर की क़ामयाबी के पीछे न तो कोई औरत है समाज में और न ही मर्द। मेरे इस्तीफे के पीछे विद्यालय के चंद मर्द और औरतें थीं और कुछ छात्र भी ! जहां तक मेरी या किसी किन्नर की कामयाबी की बात है, तो उसकी क़ामयाबी तो उसका अपना जज़्बा है, जो शिक्षा और आत्मकथाएं पढ़ने से उपजता है, लेकिन जज़्बे के दुश्मनों से जद्दोजहद हर किन्नर तो नहीं कर सकता न!" एक बार फिर लम्बी सांस लेते हुए शन्नो ने कहा और अपनी आत्मकथा की पुस्तक उसने पत्रकार को भेंट कर दी।
(मौलिक व अप्रकाशित)

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