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(1)
पीर का सागर हृदय में, मन में भारी वेदना.
अश्रु भी छलके नयन से,शून्य हो गई चेतना.
टूटता है जब हृदय, यह दशा होती सभी की.
जाने कैसे सीखते हैं, लोग दिल से खेलना. ...

(2)
वक़्त की बेवफ़ाई पर तू, आज क्यों पछता रहा.
तू भी सदा वक़्त के संग खिलवाड ही करता रहा.
वक़्त ने तो चाहा हमेशा संग लेकर तुझको चलना,
आलसी बन तू ही बैठा, वक़्त तो चलता रहा. .

.

- प्रदीप बहुगुणा दर्पण

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2012 at 10:23pm

दो मुक्तक, दोनों अलग-अलग भावों का निरुपण करते हुए.  वाह !

बधाइयाँ .. .

Comment by Pradeep Bahuguna Darpan on March 4, 2012 at 8:05pm
uttsahvardhan ke liye bahut bahut aabhar prabhakar ji...

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 3, 2012 at 10:21am

सुन्दर अभिव्यक्ति,  साधुवाद स्वीकार करें प्रदीप बहुगुणा जी

कृपया ध्यान दे...

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