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कवि‍ताएं 00 श्‍याम बि‍हारी श्‍यामल

नदी - 1

नदी ने जब-जब चाहा
गीत गाना
रेत हुई

कंठ रीते
धूल उड़ी
खेत हुई

नदी -  2

चट्टानों से खूब लड़ी
बढ़ती चली
बहती गई

मगर वह ठहरी नदी
बाँधी गई
साधी गई

 

नदी -  3

वह चाहती थी
सूखी धरती को तर करना
मरुथल को हरा-भरा
राह रोकी पर्वतों ने
आड़े आईं चट्टानें 
मगर वह रुकी नहीं
मुड़-मुड़कर निकली आगे
वह टूटी नहीं
पराजित झुकी नहीं

सूरज को निगला
चाँद को गले उतारा
आकाश काँप उठा
अब आँखें उसकी भासित थीं
वह बिफ़र रही थीं
निकली थी महासमर में 
रणचंडी बनकर


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