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मेरे ख़्वाबों से हकीक़त का क़रार है तू ,

मुद्दतों किये हर पल का इंतज़ार है तू ,
तुझसे जुड़कर मेरा नाम मुकम्मिल नज़र आता है |
 

आ समेट लूँ तुझे मैं अपनी बाहों में ,
पर लगता है डर कहीं बिखर ना जाऊं टूटकर ,
जाने कबसे इक सैलाब संभाल रखा है मैंने |
 

मेरी पहचान है तुझसे और मैं कुछ भी नहीं ,
तेरा ही सरमाया हूँ मैं, मुझमें कुछ मेरा नहीं ,
तुझमें  रहती मेरी जान है और रूह में मेरी बसता तूही |

Views: 411

Comment

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Comment by अमि तेष on April 11, 2011 at 8:05pm
bahut khub Veerendra Sir...
Comment by Veerendra Jain on April 11, 2011 at 1:21pm
Arun ji...bilkul thik..Sachin bhagwan hain aur aur unke baare me kuch likhna bhi ek dussahas hi hai..per kya karun bhakt hoon to rok nahi paya khud ko... pasand karne ke liye bahut bahut aabhar...
Comment by Veerendra Jain on April 11, 2011 at 1:18pm
Ganesh bhaiya..bahut dhanyawad....
Comment by Abhinav Arun on April 11, 2011 at 1:09pm
shaandaar sachin kriket ke bhagwaan aur unkee prashastee men aapkee kavita bahut sundar hai | haardik badhaaee virender jee !!

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 3, 2011 at 9:21pm
खुबसूरत रचना के साथ आपने अपने भावों को अभिव्यक्त किया है, क्रिकेट के विश्व विजेता होने पर बहुत बहुत बधाई ...

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