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कैसे कहू मैं दिल की .....

कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .
ख्वाब अधुरा रह गया ,
ख्वाबो पे छुरी चल गई  ,
कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .
बालपन की मन में ब्यथा ,
तन सयानी हो गई ,
लोगो की नजरो में आना ,
जवानी दुश्मन हो गई 
कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .
अपने होते ख्वाबें होती ,
मन की मुरादें मिल जाती ,
अपनों ने जो दगा किया ,
जिगर ये छलनी कर गई ,
कैसे कहू मैं दिल की ......
दिल में ही रह गई .

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Comment by आशीष यादव on July 3, 2011 at 8:09am
दिल की दिल मेँ न दब के रह जाये बात कोई।
लब को खोलो और जी भर के बात होने दो॥
Comment by Rash Bihari Ravi on July 2, 2011 at 2:07pm
dhanyabad bhaiya

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2011 at 2:05pm

बहुत अच्छे. 

दिल की दिल में रखना तनाव पैदा करता है, तनाव रक्तचाप बढ़ाता है, रक्तचाप कालांतर में हृदयाघात का कारण बनता है.भाई इतने खतरे हैं अगर अनकही ’दिल में ही रह गयी’.  सो, दिल के गिरह खोल दो, चुप मत बैठो.. और कोई गीत गाओ... :-)))

ख्वाब अधूरा  लिये यदि तन  ’सयाना’   होता है, तो इसे व्यथा   न कहें.. हम मन को सयाना करें.

Comment by Rash Bihari Ravi on July 2, 2011 at 12:51pm
dhanyabad tilak raj ji wa vandna ji

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on July 2, 2011 at 12:26pm

दिल की दिल ही में न रह जाये, बयॉं होने दें

ये वो ज़ज्‍बा है जिसे खुल के अयॉं होने दें।

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