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गजल(कहूँगा बात मैं....)

1222    1222    1222   1222

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कहूँगा बात हो जैसी,अरे मैं तो सलीके से
समझ लो बासमझ,झगड़ो नहीं ,आओ सलीके से।1


लगे हैं दाग ये कितने तुम्हारे आस्तीनों पर
अभी भी वक्त है पगले जरा धो लो सलीके से।2


बहाया खूं पता कितना शरीफों का, गरीबों का?
अगर सच में जिगर धड़के जरा रो लो सलीके से।3


बहुत इमदाद मुँह से बाँटते हो तुम गरीबों में
फ़टी झोली अभी भी है विलखते वो सलीके से।4


पटकने सर लगे कितने कहा जब सच कभी मैंने
मुरव्वत भी,अदावत भी निभा लो ओ सलीके से।5

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Shyam Narain Verma on May 4, 2018 at 2:55pm
इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई
Comment by Harash Mahajan on May 4, 2018 at 2:21pm

आदरणीय मनन जी बहुत ही सुंदर भावों से सजी है
आपकी ये कृति |सुंदर सृज़न के बधाई |

बाकी गुनिजन अपनी राय देंगे ...

सादर |

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