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मेरे आंगन में जब सुबह की पहली किरण आती हैं ,
तो कभी मैं उसको,
तो कभी अपनी माँ को निहारती हूँ ,
न जाने क्यों मुझे इन दोनों में
एक समानता सी लगती है 
उधर पूरब से भास्कर सफ़र शुरू करता है
और इधर माँ का दिन शुरू होता है
हाथ में जल का लोटा उठाये
कुछ मंत्रो के साथ,
हर सुबह मनमोहक हो जाती है
मेरे आंगन में जब सुबह की पहली किरण आती हैं ,

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 3, 2011 at 10:07pm

रचना और इसकी अंतर्धारा पवित्र है. इस अच्छे प्रयास के लिये हार्दिक शुभकामनाएँ.. 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 6, 2011 at 7:42pm
स्पेलिंग मिस्टेक के लिए खेद है नीत गिरी बेटे !
Comment by Neet Giri on June 6, 2011 at 7:29pm
इस कदर मनोबल को बढ़ने हेतु धन्यवाद सर, एक और बात सर मेरा नाम नीत हैं,

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 4, 2011 at 12:00pm
नील गिरी बेटे बहुत सुन्दर प्रयास है आपका - इसके लिए आपको बधाई देता हूँ ! और भविष्य में और भी स्तरीय रचनायों की आशा करता हूँ !

कृपया ध्यान दे...

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