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मुक्तिका : माँ _संजीव 'सलिल'

मुक्तिका "माँ"
संजीव 'सलिल'
*
बेटों के दिल पर है माँ का राज अभी तक.
माँ के आशिष का है सिर पर ताज अभी तक..

प्रभू दयालु हों इसी तरह हर एक बेटे पर
श्री वास्तव में माँ है, है अंदाज़ अभी तक..

बेटे जो स्वर-सरगम जीवन भर गुंजाते.
सत्य कहूँ माँ ही है उसका साज अभी तक..

बेटे के बिन माँ का कोई काम न रुकता.
माँ बिन बेटों का रुकता हर काज अभी तक..

नहीं रही माँ जैसे ही बेटा सुनता है.
बेटे के दिल पर गिरती है गाज अभी तक..

माँ गौरैया के डैने, ममता की छाया.
पा बेटे हो जाते हैं शहबाज़ अभी तक..

कोई गलती हो जाये तो आँख न उठती.
माँ से आती 'सलिल' सुतों को लाज अभी तक..

नानी तो बन गयी, कभी दादी बन जाऊँ.
माँ भरती है 'सलिल' यही परवाज़ अभी तक..

********

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Comment by Dheeraj on May 2, 2011 at 9:28pm
निःसंदेह माँ  को कब कहाँ कैसे कोई एक पल को भुलाए
और जो नादान ये करे दुःसाहास वो क्यो ना फिर हर जनम पछ्त्ताये

माँ की महिमा कौन गाये माँ अपने आप मे ही संपूर्ण है जिसके श्रवण मात्र से हृदय पुलकित हो जाए और आत्मा तृप्त.

अच्छी रचना ................. आभार स्वीकार करे

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