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ग़ज़ल---तू आज नहीं आयी तो जान ये जानी है

221 1222 221 1222

तू आज नहीं आयी तो जान ये जानी है
मैं रोज कहूँ ऐसा ये बात पुरानी है
......
कुछ वादे तेरे झूठे कुछ तोड दिये मैंने
ये कैसी मुहब्बत है ये कैसी कहानी है
...
बस चाँद सितारे हैं जो साथ जगे मेरे 
उनके ही सहारे से अब याद भुलानी है
..
जिस रोज उतर जाये उस रोज चले आना
कुछ दिन ही चलेगा बस ये जोश जवानी है
....
सच यार कहूँ दिल से हैं  बात ये सब झूठी
तेरा मैं  दिवाना हूँ तू मेरी दिवानी है
--------------
उमेश कटारा 
मौलिक व अप्रकाशित

Views: 824

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Comment by umesh katara on March 23, 2015 at 8:37pm

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तवजी शुक्रिया

Comment by umesh katara on March 23, 2015 at 8:36pm

आदरणीय  Nidhi Agrawalजी शुक्रिया

Comment by umesh katara on March 23, 2015 at 8:36pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 7:59pm
आदरणीय उमेश भाई जी बहुत उम्दा और बेहतरीन ग़ज़ल हुई है। ग़ज़ल का मतला और जोश जवानी वाला शेर कमाल का हुआ है। आपको बधाई।
शेर दर शेर दाद हाज़िर है।
Comment by umesh katara on March 23, 2015 at 7:33pm

जी सर मिथिलेश जी आप की बात सिरोधार्य है आपसे क्या छुपता है 
बहर 
221 1222 221 1222 ही है
आप सभी सुधी जनों का बहुत आभार

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 23, 2015 at 2:13pm

आ० कटारा जी

मिथलेश जी 'बहर' की बात कर रहे हैं . सादर .

Comment by Nidhi Agrawal on March 23, 2015 at 1:59pm

आदरणीय उमेशजी  आप हमेशा अच्छा लिखते हो ..:) ये गजल भी अच्छी बनी  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 11:35am
बह्र बिना सब सूना रे भाई बह्र बिना सब सूना
221/ 1222/ 221/ 1222

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