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ग़ज़ल:- अपने शहर में झूठ के चर्चे आम बहुत हैं

ग़ज़ल:- अपने शहर में झूठ के चर्चे आम बहुत हैं

 

अपने शहर में झूठ के चर्चे आम बहुत हैं ,

सच कहने वालों के सर इलज़ाम बहुत हैं |

 

इस अखबार के हर पन्ने पर लूट खसोट ,

तुम कहते हो दुनिया में इंसान बहुत हैं |

 

जिस लड़की को नुक्कड़ पर तुमने था छेड़ा ,

उस लड़की के पापा अब परेशान बहुत हैं |

 

सच्चाई की आदर्शों की अलख जगाते ,

ऐसे कवि को मिलते कहाँ इनाम बहुत हैं |

 

एक मुनादी आज सुबह इस शहर में घूमी ,

कुबड़े काने राजा के फरमान बहुत हैं |

 

(@अभिनव अरुण # १६-०१-२००३)

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