For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जब से उस युवा चींटे के पँख निकले थे वह हवा बातें करने लगा था. उसने सभी परिजनों और मित्रजनो पर अपने नए नए निकले पँखों का रुआब डालना शुरू कर दिया था, उसका आत्मविश्वास देखते ही देखते आत्ममुग्धता का रूप धारण कर गया। इस बदले हुए स्वरूप को देख देख उसकी माँ रूह तक काँप जाती. लाख समझाने पर भी बेटा यथार्थ के धरातल पर आने को तैयार न हुआ तो एक दिन बूढ़ी माँ ने अपनी बहू को सफ़ेद जोड़ा देते हुए भरे गले से कहा "इसे अपने पास रख ले बेटी।" 

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 1080

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:40pm

दिल से शुक्रिया अग्रज लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:38pm

आ० लक्ष्मण धामी जी, रचना के मर्म को समझने और मेरे प्रयास को सराहने के लिए दिल  से आभार।


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:35pm

सादर आभार आ० विनय कुमार सिंह जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:34pm

रचना पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया हेतु सादर आभार भाई जितेंद्र जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:33pm

धन्यवाद प्रिय गीतिका, लेकिन माँ की बात समझी कहाँ गई ? तभी तो सफ़ेद जोड़े की नौबत आ गई.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:28pm

आ० राजेश कुमारी जी, यहाँ माँ एक प्रतीक है. प्रतीक है एक प्रौढ़ सोच की, घर/समूह के ज़िम्मेवार मुखिया की जिसे खुशफहमो के अंजाम का भली भांति अंदाजा है. बहरहाल, आपकी सराहना से बेहद ख़ुशी हुई. आपकी गुणग्राहकता  और सदशयता का दिल से आभार।                


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:28pm

आप ने बिलकुल सही फ़रमाया आ० विंदू जी,  यही आत्ममुग्धता मेरी इस रचना का केंद्र बिंदु है. रचना पसंद करने के  हार्दिक आभार।


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:28pm

सादर धन्यवाद आ० मंजरी पाण्डेय जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:28pm

आ० नादिर खान जी, भले ही लघुकथा में एक विशेष क्षण की बात होती है लेकिन यह अक्सर अपने अंदर एक पूरा उपन्यास समाये हुए होती है. आपको लघुकथा आई, आपका दिल से शुक्रिया।


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 10, 2014 at 12:27pm

आ० डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, रचना को समय देने और मान बख्शने हेतु दिल से शुक्रिया। ओबीओ पर हम दूसरे से ही तो सीख रहे हैं.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Feb 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service