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कैसी शुष्कता है?

जो धूप में

बदन झुलसा रही..

भीतर इतनी आग

विरह की जो

केवल धुआँ

और धुआँ देती है

राख तक नसीब नहीं

जिसे रख दूँ संजो कर

तेरी हथेली पर

जब मिलन की बेला हो

और कहूँ कि....

यह पाया मैंने

तुझ बिन...!

     जितेन्द्र ' गीत '

( मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 3, 2014 at 9:20pm

आपकी बधाई हृदयतल से स्वीकार है आदरणीय सौरभ जी, मैंने जो कुछ भी लिखा यहीं ओ बी ओ परिवार के सानिध्य में ही सीखा है आप सभी के स्नेह व् मार्गदर्शन से ही मेरी भावनाओं को शब्द मिले है.

सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 2, 2014 at 1:58am

क्या लिखने लगे हैं भाईजी !!...... 

दिल से बधाई.. .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 30, 2014 at 11:48pm

आपने रचना के भावों को छुआ, आपकी संवेदनशीलता को नमन आदरणीय आशीष जी. स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 30, 2014 at 11:44pm

रचना पर आपके सराहनीय अनुमोदन से बहुत संबल मिला आदरणीया विन्दु बाबु जी, आपका बहुत बहुत आभार

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 30, 2014 at 11:37pm

आपकी उत्साहवर्धक सराहना से मुझे बहुत ख़ुशी व् लेखनकर्म को अति मनोबल मिला है आदरणीया डा.प्राची जी, आपका ह्रदय से आभार

सादर!

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 30, 2014 at 11:35pm

आह... खूबसूरत | संवेदनशील रचना.. हर किसी को अपनों की अहमियत समझनी चाहिए |

अच्छा सन्देश |

Comment by Vindu Babu on April 30, 2014 at 10:53pm

आदरणीय जितेन्द्र जी:

विरह की वेदना को अच्छे ढंग से उकेरा है अपने ।

आपको हार्दिक बधाई इस सघन अभिव्यक्ति के लिए।

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 30, 2014 at 10:08pm

विरह में व्याप्त सूनेपन और रह जाते खाली हाथों को बहुत मार्मिक शब्द मिले हैं 

इस भाव सान्द्र प्रस्तुति पर मेरी बधाई स्वीकारिये 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2014 at 12:29pm

आपकी बधाई सहर्ष स्वीकार है आदरणीया मीना दीदी, अपना स्नेहिल आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by Meena Pathak on April 28, 2014 at 10:59am

कम शब्दों में बहुत कुछ ......

बहुत बहुत बधाई ... स्नेहाशीष

कृपया ध्यान दे...

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