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गीत (दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ)

गीत (दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ)

दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ, कोशिशें करके इनको घटा दीजिए,

एक कदम मैं चलूँ, एक कदम तुम चलो, धूल नफरत की दिल से हटा दीजिए।

 

कहना चाहते हो गर तुम तो खुल के कहो,

वरना रिश्ता ये बदनाम हो जाएगा,

लाख चाहो छुपाना ज़माने से पर,

एक दिन ये सरेआम हो जाएगा,

सुबह की चाय में घोलकर प्यार को, थोड़ी - थोड़ी सी सबको पिला दीजिए,

एक कदम मैं चलूँ, एक कदम तुम चलो, धूल नफरत की दिल से हटा दीजिए।

दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ......

 

फेरना ना निगाहें हमें देखकर,

रूठ बैठे हो हमसे क्या काफी नहीं,

गल्तियाँ हो ही जाती हैं इन्सान से,

ऐसा भी क्या हमें कोई माफी नहीं,

मन तुम्हारा अगर हमसे चोटिल हुआ, उसमें यादों का मरहम लगा दीजिए,
एक कदम मैं चलूँ, एक कदम तुम चलो, धूल नफरत की दिल से हटा दीजिए।

दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ......

 

याद है एक दिन आप हमको मिले,

गालों पर मोतियों की थी बिखरी लड़ी,

बादलों ने उकेरी जो तेरी छवि,

आँसू बरसे वहाँ से भी बनके झड़ी,

इस उफनती नदी को मेरी आँख के, गहरे सागर में लाकर समा दीजिए,

एक कदम मैं चलूँ, एक कदम तुम चलो, धूल नफरत की दिल से हटा दीजिए।

दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ......

.

सुशील जोशी

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Sushil.Joshi on November 5, 2013 at 8:45am

आपके अनुमोदन के लिए बहुत बहुत आभार आ0 सौरभ जी..... आपकी अनमोल सलाह सर आँखों पर......


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 15, 2013 at 11:51pm

दिल से बधाई, आदरणीय.

सुन्दर गीत हुआ है.

वैसे एक ही गीत में एक ही बिम्ब के  लिए तू, तुम और आप उचित नहीं माना जाता. और भाव की अभिव्यक्ति भी खिंच सी जाती है.

सादर

Comment by Sushil.Joshi on October 7, 2013 at 9:27pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय बृजेश जी.... कृपया गीत के शिल्प से संबंधित जानकारी देने का प्रयास करें....

Comment by Sushil.Joshi on October 7, 2013 at 9:26pm

इस गीत पर अपनी अनमोल प्रतिक्रिया देने हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीया डॉ. प्राची जी.... आपने सही पहचाना.... अब तक तो मैं अपने गीतों में केवल स्वत: मन पर आने वाले भाव लिखता जाता हूँ..... यद्दपि मैं गीत लेखन में अभी एक नया विद्दार्थी हूँ, इसलिए आपसे अनुरोध है कि गीत की शिल्प रचना के विषय में थोड़ा विस्तार से समझाने का कष्ट करें.... मैंने इस संदर्भ में अंतर्जाल की सहायता लेने की भी काफी कोशिश की है लेकिन सफ़लता नहीं मिली.... आपसे एवं समस्त एड्मिन टीम से विनती है, यदि संभव हो तो ओबीओ पाठशाला के अंतर्गत गीत विधा के शिल्प पर भी प्रकाश डालें... जिससे मुझे अपने गीतों से खर-पतवार हटाने में सहायता मिल सके... सादर..

Comment by Sushil.Joshi on October 7, 2013 at 9:16pm

गीत पर स्नेह बरसाने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीया सावित्री जी....

Comment by Sushil.Joshi on October 7, 2013 at 9:15pm

गीत के भाव आपके मन को छूने में सफल रहे तो मेरी लेखनी भी सफल हुई, टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय मुखर्जी साहब....

Comment by Sushil.Joshi on October 7, 2013 at 9:13pm

अपने इस गीत में आपकी इस अनमोल टिप्पणी को पाकर मैं धन्य हुआ आदरणीय अरुन निगम जी.... आपको गुरु मानकर आपके सानिध्य में कुण्डलिया छंद पर अपनी पकड़ को मजबूत करने का भविष्य में अवश्य प्रयास करूँगा.... आपके आशीर्वचनों के लिए दिल से आभार...

Comment by Sushil.Joshi on October 7, 2013 at 9:09pm

इस गीत को पसंद कर अपने विचार देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय अरुन भाई.....

Comment by Sushil.Joshi on October 7, 2013 at 9:07pm

आदरणीया महिमा जी.... आपको गीत अच्छा लगा इस हेतु आपका अतिश: धन्यवाद...

Comment by Sushil.Joshi on October 7, 2013 at 9:06pm

गीत आपको प्रभावित करने में सफल रहा तो मेरा लेखन भी सफल हुआ आदरणीय अनुराग जी...

कृपया ध्यान दे...

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