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जीवन में पहली बार कुण्डलियाँ लिखने का प्रयास किया है. आप सबका मार्गदर्शन प्रार्थनीय है.

अम्बे तेरी वंदना, करता हूँ दिन-रात

मिल जाए मुझको जगह, चरणों में हे मात

चरणों में हे मात, सदा तेरे गुण गाऊँ

चरण-कमल-रज मात, नित्य ही शीश लगाऊँ

अर्पित हैं मन-प्राण, दया करिए जगदम्बे

शब्दों को दो अर्थ, मात मेरी हे अम्बे

.

- बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on October 7, 2013 at 6:58pm

आदरणीया गीतिका जी मेरे प्रयास को आपका अनुमोदन प्राप्त हुआ, मेरे प्रयास की यही सार्थकता है!

Comment by वेदिका on October 7, 2013 at 1:46am

प्रथम प्रयास ही इतना उन्नत है कि मन हर्षित होता है

बधाई !!

Comment by बृजेश नीरज on October 4, 2013 at 5:37pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 4, 2013 at 11:51am

सुंदर कुंडली रचना,बधाई स्वीकारें आदरणीय बृजेश जी

Comment by बृजेश नीरज on October 3, 2013 at 11:07pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 10:47pm

आदरणीय बृजेश जी सुंदर कुण्डलिया रचन हेतु बधाई । 

Comment by बृजेश नीरज on October 3, 2013 at 6:55pm

आदरणीया प्राची जी आपका हार्दिक आभार!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 3, 2013 at 6:49pm

बहुत ही सुन्दर सार्थक प्रयास है आदरणीय बृजेश जी 

जगज्जननी के श्री चरणों में अर्पित इस वंदन के लिए ह्रदय से बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on October 3, 2013 at 6:15pm

आदरणीय सौरभ जी आपका हार्दिक आभार!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2013 at 6:14pm

प्रथम प्रयास प्रिय अनुभूति .. .

बधाई

कृपया ध्यान दे...

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